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रांची/डेस्क: झारखंड हाईकोर्ट ने गैर-औपचारिक शिक्षा योजना में काम कर चुके 35 सुपरवाइजरों को झारखंड सरकार की नियमित सेवा में शामिल करने की मांग खारिज कर दी है. कोर्ट ने कहा कि पुरानी सूची में नाम शामिल होने मात्र से सरकारी नौकरी पाने का पक्का अधिकार नहीं बन जाता. योजना बंद हो चुकी है और इन लोगों की नियुक्ति नियमित सरकारी पदों पर नहीं हुई थी. मामले दाखिल याचिका पर फैसला सुनाते हुए न्यायाधीश दीपक रोशन की एकलपीठ ने याचिका खारिज कर दी. मामले में लाल बिद्या बिनय नाथ शाहदेव, विद्यापति उपाध्याय समेत 35 अन्य की ओर से रिट पिटीशन दाखिल की गई थी.
1980 के दशक में हुई थी नियुक्ति
मामला गैर-औपचारिक शिक्षा योजना से जुड़ा है. यह केंद्र सरकार की योजना थी, जिसके तहत 6 से 14 वर्ष के बच्चों को शुरुआती शिक्षा देने के लिए सुपरवाइजर और इंस्ट्रक्टर रखे गए थे. याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति तत्कालीन बिहार राज्य में 1980 के दशक में चयन प्रक्रिया के बाद हुई थी. उन्होंने तीन साल से अधिक समय तक सुपरवाइजर के रूप में काम किया.
बिहार और झारखंड अलग होने के बाद इन सुपरवाइजरों का मामला झारखंड से जुड़ गया. अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, तीन साल या उससे अधिक समय तक काम करने वाले 2,655 सुपरवाइजरों की सूची तैयार की गई थी. इनमें 676 लोग उन इलाकों से थे, जो बाद में झारखंड का हिस्सा बने. 23 दिसंबर 2000 को इन 676 लोगों के नाम झारखंड के मुख्य सचिव को भेजे गए थे.
बिहार में कुछ लोगों को सेवा में लिया गया, झारखंड में नहीं
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि बिहार में उनके जैसे करीब 1,863 सुपरवाइजरों को सरकारी सेवा में शामिल किया गया, लेकिन झारखंड में ऐसा नहीं हुआ. इसी आधार पर उन्होंने अपने लिए भी सरकारी सेवा में शामिल किए जाने की मांग की. उन्होंने यह भी कहा कि उनके मामले में पुराने न्यायिक आदेश और सरकारी प्रक्रिया पहले से मौजूद थी. इसलिए राज्य बनने के बाद झारखंड सरकार को भी उसी आधार पर कार्रवाई करनी चाहिए थी.
सरकार ने क्या कहा?
झारखंड सरकार की ओर से इसका विरोध किया गया. सरकार ने कहा कि ये सुपरवाइजर नियमित सरकारी कर्मचारी नहीं थे. उन्हें योजना के तहत मानदेय पर रखा गया था और वे किसी स्थायी सरकारी पद पर नियुक्त नहीं हुए थे. सरकार ने यह भी कहा कि गैर-औपचारिक शिक्षा योजना बंद हो चुकी है. इसलिए योजना खत्म होने के बाद उसमें काम करने वाले लोगों को अपने-आप नियमित सरकारी नौकरी देने का अधिकार नहीं बनता.
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट ने कहा कि 2,655 लोगों की सूची में नाम होना अपने-आप सरकारी नौकरी का अधिकार नहीं देता. अदालत के मुताबिक, पुरानी प्रक्रिया को आधार बनाकर झारखंड में नियमित सरकारी सेवा में नियुक्ति का आदेश नहीं दिया जा सकता.
कोर्ट ने यह भी कहा कि बिहार और झारखंड अलग-अलग राज्य हैं और दोनों की सरकारी सेवाओं से जुड़े नियम अलग हो सकते हैं. बिहार में किसी व्यवस्था के तहत हुई कार्रवाई को झारखंड में अपने-आप लागू नहीं किया जा सकता. अदालत ने माना कि इन लोगों ने लंबे समय तक अपने मामले के लिए प्रयास किया है, लेकिन केवल इतने लंबे समय तक मामला चलने के आधार पर सरकारी नौकरी देने का आदेश नहीं दिया जा सकता. इसके लिए लागू नियमों और सरकारी व्यवस्था का पालन जरूरी है. हाईकोर्ट ने 16 दिसंबर 2021 के उस आदेश में कोई ऐसी गलती नहीं पाई, जिसके आधार पर उसे रद्द किया जा सके.