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पलामू/डेस्क: समाज के सजग प्रहरी जब अपनी लेखनी के साथ-साथ दिल के दरवाजों को भी खुला रखते हैं, तो व्यवस्था का चेहरा अपने आप मानवीय हो जाता है. पलामू की धरती पर मानवता का एक ऐसा ही अध्याय तब लिखा गया जब पलामू पत्रकार परिषद के सदस्यों ने मेदिनीनगर बस डिपो के एक अंधेरे कोने में दम तोड़ रहे दिव्यांग बबलू गौड़ की चीखों को सुना. यह केवल एक खबर नहीं है, बल्कि उस विश्वास की जीत है जो बताती है कि अगर इरादे नेक हों तो सरकारी तंत्र भी पूरी शिद्दत के साथ मदद के लिए आगे आता है.
सोनभद्र, उत्तर प्रदेश का रहने वाला बबलू गौड़, जिसका जीवन एक क्रशर मशीन की भेंट चढ़ गया था, मेदिनीनगर की सड़कों पर लावारिस बनकर रह गया था. कटा हुआ पैर और सड़ते हुए जख्म उसे तिल-तिल कर मौत की ओर धकेल रहे थे. ऐसे समय में जब राहगीर नजरें फेर कर निकल रहे थे, पूर्व अध्यक्ष ब्रजेश तिवारी और राजेश श्रीवास्तव की पारखी नजरों ने उसकी पीड़ा को पहचाना. उन्होंने उसे केवल लावारिस नहीं छोड़ा, बल्कि उसे सहारा देकर सूचना भवन पहुंचाया, जहां से उसकी जिंदगी के नए सफर की शुरुआत हुई.
परिषद के अध्यक्ष नीलकमल मेहरा और ब्रजेश तिवारी ने जब उपायुक्त दिलीप प्रताप सिंह शेखावत के सामने इस मार्मिक स्थिति को रखा, तो प्रशासन का भी एक ऐसा रूप दिखा जो अक्सर फाइलों में दबा रह जाता है. उपायुक्त ने न केवल तत्परता दिखाई, बल्कि पद की गरिमा के साथ-साथ इंसानियत का फर्ज निभाते हुए खुद उस दिव्यांग के पास पहुँचकर उसका संबल बढ़ाया. उन्होंने तत्काल सरकारी तंत्र को सक्रिय किया और एमएमसीएच (MMCH) में उसके इलाज की पुख्ता व्यवस्था सुनिश्चित कराई.
आज बबलू गौड़ अस्पताल के बिस्तर पर सुरक्षित है, जहां उसकी पट्टियां बदली जा रही हैं और उसे पौष्टिक भोजन मिल रहा है. पलामू पत्रकार परिषद का यह कार्य उन सभी के लिए एक कड़ा संदेश है जो पत्रकारिता को केवल सूचनाओं का माध्यम समझते हैं. यह घटना चीख-चीख कर कह रही है कि जब सजग पत्रकार और संवेदनशील अधिकारी एक साथ मिल जाते हैं, तो किसी भी बेसहारा की जिंदगी का बुझता हुआ दीया फिर से रोशन किया जा सकता है.
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