न्यूज़11 भारत
रांची/डेस्क: झारखंड उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के विभिन्न विभागों में आउटसोर्सिंग के जरिए होने वाली बहालियों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है. अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि सरकार के स्वीकृत और स्थायी पदों पर आउटसोर्सिंग एजेंसियों के माध्यम से कर्मचारियों को रखना पूरी तरह से असंवैधानिक और अवैध है. इस ऐतिहासिक फैसले के साथ कोर्ट ने राज्य के विभिन्न जेलों में एक दशक से अधिक समय से कार्यरत दैनिक वेतनभोगियों को बड़ी राहत दी है. कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया है कि इन सभी कर्मचारियों की सेवाओं को 8 सप्ताह के भीतर नियमित किया जाए.
क्या था पूरा विवाद?
यह पूरा मामला झारखंड के गृह, कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग (जेल विभाग) से जुड़ा है. लक्ष्मीकांत गुइन (बोकारो), कृष्णा राम (हजारीबाग), सरस्वती देवी (लातेहार) और वरुण कुमार (लोहरदगा) सहित दर्जनों दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी पिछले 10 से अधिक वर्षों से जेलों में ड्राइवर और चतुर्थ वर्ग के स्थायी व स्वीकृत पदों पर काम कर रहे थे.
जब इन कर्मचारियों ने एक दशक की सेवा के बाद नियमितीकरण (परमानेंट करने) की मांग उठाई, तो कारा महानिरीक्षक (IG Prison) ने 23 नवंबर 2021 को एक विवादित आदेश जारी कर दिया. इस आदेश में कहा गया कि जो दैनिक वेतनभोगी पहले से स्वीकृत पदों पर काम कर रहे हैं, उन्हें अब हटाकर निजी आउटसोर्सिंग एजेंसियों के अधीन कर दिया जाए. सरकार के इस फैसले को कर्मचारियों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती दी थी.
हाई कोर्ट ने क्यों लगाई आउटसोर्सिंग पर रोक?
न्यायाधीश दीपक रोशन की एकल पीठ ने इस मामले से जुड़ी सभी रिट याचिकाओं को एकसाथ स्वीकार करते हुए सरकार के कदम को 'शक्तियों का दुरुपयोग' और 'कर्मचारियों का शोषण' करार दिया. हाई कोर्ट ने मामले में एमिकस क्यूरी सीनियर एडवोकैट मनोज टंडन की इस दलील को सही माना कि जेल और गृह विभाग जैसे संवेदनशील सरकारी संस्थानों में आउटसोर्सिंग से कर्मचारी रखना सुरक्षा के दृष्टिकोण से बेहद खतरनाक है. यदि कोई आउटसोर्स कर्मचारी जेल में कोई गंभीर दुराचार या लापरवाही करता है, तो सरकार का उस पर कोई सीधा प्रशासनिक नियंत्रण नहीं रहेगा, जिससे जेलों में अराजकता फैल सकती है.
कोर्ट ने कहा कि जब कर्मचारी दैनिक या अनुबंध पर सीधे सरकार के अधीन काम करते थे, तो उनके काम का पूरा पैसा सीधे उनकी जेब में जाता था. लेकिन आउटसोर्सिंग लागू होने से गरीब और कड़ी मेहनत करने वाले कर्मचारियों की कीमत पर मुख्य मलाई निजी एजेंसियां खा रही हैं. यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 (समानता और रोजगार के अधिकार) का खुला उल्लंघन है.
बिना किसी नीति के लिया गया था फैसला
अदालत ने सरकारी फाइलों की जांच के बाद पाया कि जेल विभाग के अधिकारियों ने जब 23 नवंबर 2021 को आउटसोर्सिंग का आदेश जारी किया था, तब तक झारखंड सरकार के प्रशासनिक विभाग ने आउटसोर्सिंग को लेकर कोई आधिकारिक नीतिगत फैसला (Policy Decision) लिया ही नहीं था. अधिकारियों ने अपनी मर्जी से यह तुगलकी फरमान जारी किया था.
अदालत ने एक भावुक और गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि जब राज्य (सरकार) जैसी ताकतवर संस्था किसी गरीब और लाचार दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी के साथ अनुबंध करती है, तो यह असमानता कोई इत्तेफाक नहीं बल्कि ढांचागत शोषण है. ऐसे मामलों में अदालतें चुप नहीं बैठ सकतीं.
अदालत का अंतिम और कड़ा आदेश
हाई कोर्ट ने सरकार के 23 नवंबर 2021 के आउटसोर्सिंग वाले आदेश को पूरी तरह से रद्द (Set Aside) कर दिया है. कोर्ट ने जेल विभाग को निर्देश दिया कि इन सभी याचिकाकर्ताओं को उसी तर्ज पर 8 हफ्तों के भीतर परमानेंट किया जाए, जिस तरह सरकार ने पूर्व में 183 चतुर्थ वर्गीय कर्मचारियों को नियमित किया था.
नियमित होने तक इन सभी कर्मचारियों को वही पुराना दैनिक/अनुबंध वेतन मिलता रहेगा, जो उन्हें नवंबर 2021 से पहले मिल रहा था. अदालत ने अपने अंतरिम आदेश को स्थायी बनाते हुए झारखंड सरकार पर भविष्य में किसी भी स्वीकृत और खाली पड़े सरकारी पद पर आउटसोर्सिंग के जरिए बहाली करने पर पूरी तरह से रोक लगा दी है.
यह भी पढ़ें- ट्रांसपोर्ट नगर के शीघ्र संचालन एवं आवंटन प्रक्रिया को लेकर झारखण्ड चैम्बर ने परिवहन सचिव से की मुलाकात