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रांची/डेस्क: बिहार में इसी साल विधानसभा चुनाव होने वाले है. ऐसे में सभी राजनीतिक दल अभी से ही शक्ति प्रदर्शन करने में जुट गई है. सभी ने चुनाव को लेकर अपनी कमर कस ली है. नीतीश कुमार पिछले 20 सालों से बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर विराजे हुए है. लेकिन उन्हें बीमार, बूढ़ा और कमजोर साबित करने के लिए होड़ लगी हुई है. उनके पीछा पूरा विपक्ष हाथ धोकर पड़ा हुआ है. जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर और RJD नेता तेजस्वी यादव यह लगातार कह रहे रही कि अब नीतीश कुमार में बिहार संभालने की क्षमता नहीं है. ऐसे में यह कयास लगाये जा रहे है कि इस साल के विधानसभा चुनाव में पिछली बार से भी खराब स्थिति JDU की होने वाली है. हालांकि नीतीश कुमार को लेकर चुनावी आकलन करने वाले मात खाते रहे हैं. नीतीश कुमार को कमतर आंकने की सिर्फ एक ही कारण है कि नीतीश की पार्टी जेडीयू ने साल 2020 के चुनाव में 43 सीटें जीती थी. ऐसे में वह राज्य में तीसरे स्थान पर थी. अगर 2020 को अपवाद मान ले तो अब तक सीटों की संख्या और नतीजों में एनडीए में जेडीयू का रुतबा बड़े भाई की तरह रहा है. यही नहीं साल 2015 के विधानसभा चुनाव में JDU को RJD ने बड़े भाई के तौर पर रखा था. आइए अब जरा नीतीश कुमार के वास्तविक स्थिति का आकलन करते है.
BJP का बड़ा भाई बनते रहे है नीतीश?
इस बारे में जानने के लिए आपको यह भी जानना जरूरी है कि 2005 से अब तक JDU और भाजपा की लड़ी गई सीटों की संह्या क्या है. बता दें कि विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा चुनाव JDU ने BJP के बराबर या उससे अधिक सीटों पर ही चुनाव लड़ा है.
2004 लोकसभा और 2005 विधानसभा चुनाव
बात करें 2005 में हुए विधानसभा चुनाव कि तो JDU ने कुल 139 सीटों पर चुनाव लड़ा था और इसमें 88 सीटों पर जीत हासिल की थी. वहीं भारतीय जनता पार्टी ने कुल 102 सेटों पर चुनाव लड़ा था और 55 सीटों पर जीत हासिल की थी. वहीं इसके एक साल पहले यानी 2004 के लोकसभा चुनाव ने बिहार में JDU ने 24 सीटों पर और भाजपा ने 16 सीटों पर चुनाव लड़ा था. इस चुनाव में JDU ने 6 सीटों पर जीत हासिल की थी और भाजपा ने 5 सीटों पर जीत हासिल किया था.
2010 विधानसभा चुनाव
साल 2010 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की JDU भाजपा के बड़े भाई के तौर पर बनी रही. इस चुनाव में JDU ने कुल 114 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 115 सीटों पर जीत हासिल की थी. वहीं भाजपा में 102 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 91 सीटों पर जीत हासिल की थी. परिणाम से यह साफ़ है कि JDU बड़े भाई के तौर पर बनी रही.
2015चुनाव में RJD के भी बड़े भाई बने नीतीश!
साल 2015 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी JDU को भाजपा से अलग किया और RJD के साथ मिलकर चुनाव लड़ा. इस चुनाव में RJD ने नीतीश कुमार को अपना बड़ा भाई बनाते हुए CM फेस के लिए प्रोजेक्ट अर्ते हुए चुनाव लड़ा था. दोनों ही पार्टियों ने 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ा था.
2014 लोकसभा चुनाव में नीतीश को मिला सबक
साल 2014 लोकसभा चुनाव की बात करें तो नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी JDU को सबसे अलग करके चुनाव लड़ा था. इस चुनाव के परिणाम से उन्हें पता चला कि अकेले लड़कर कामियाब होना आसान नहीं है. इस चुनाव में JDU केवल 2 सीटों पर ही सिमट गई थी. इसके बाद के लोकसभा चुनाव में यानी साल 2019 के चुनाव में उन्होंने एक बार फिर से भाजपा का हाथ थामा. इसके बाद दोनों BJP और JDU बराबर 17-17 सीटों पर चुनाव लड़ी थी. एसेमे इस बार भी भाजपा ने उन्हें अपने बड़े भाई का रुतबा दिया. भाजपा ने साल 2014 में जीती हुई 5 सीटें JDU के लिए छोड़ दी थी. ऐसे में JDU सांसदों की संख्या भाजपा से एक कम 16 हो गई. साल 2020 के विधानसभा चुनाव में अगर नीतीश कुमार की स्थिति चिराग पासवान ने नहीं बिगाड़ी होती तो शायद ही नीतीश कुमार की ताकत घटने का कोई आकलन करता. ऐसे में भाजपा ने 2024 के विधानसभा चुनाव में JDU को एक सीट कम देकर उसे छोटे भाई का एहसास कराने की कोशिश किया. हालांकि अगर CM पद को लेकर बात करें तो नीतीश बड़ा भाई के रुतबे में बने रहे.
चिराग के कारण घटी सीट लेकिन ताकत बरकरार
अगर लोजपा-आर के नेता चिराग पासवान ने नीतीश कुमार के साथ धोखा नहीं किया होता, तो उन्हें इतना कमजोर समझने या आकलन करने की कोई कोशिश भी नहीं करता. JDU बताती है कि चिराग पासवान के कारण उन्हें 3 दर्जन सीटों का नुकसान हुआ था. बता दें कि NDA से अलग होअर चिराग पासवान ने अपने कुल 134 उम्मेदवार खड़े कर दिए थे. ऐसा कहा जाता है कि इसमें भाजपा की भी शय थी. इस बात को इस कारण बल मिलता है क्योंकि चिराग ने उस समय चुन-चुन कर उन्ही सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे जहां JDU ने अपने उम्मीदवार उतारे थे. लेकिन हकीकत यह है कि बिहार के लोग नीतीश से उठने नाराज नहीं थे. जितना असर साल 2020 के चुनाव में देखने को मिला था. चुनाव के परिणाम से बिहार के लोग नीतीश को कमजोर समझने लगे थे. ऐसे में इसके बाद हुए 2024 लोकसभा चुनाव में स्थिति स्पष्ट हो गई. इसके नतीजों से यह साफ हो गया कि बुढ़ापे में भी नीतीश कुमार की ताकत बरकरार है. भाजपा ने जितनी सीटों पर जीत हासिल की उतनी ही सीटों पर नीतीश कुमार के JDU ने भी जीत हासिल कर ली. ऐसे में चुनाव का आकलन करने वाले राजनीतिक पंडित भी मात खा गए.
हेल्थ से कर रहे नीतीश कुमार की ताकत का आकलन
लोकसभा चुनाव को बीते डेढ़ साल भी पूरा नहीं हुआ है. इतने में बिहार विधानसभा चुनाव आ गया है. लेकिन डेढ़ सालों में उनकी उतनी ताकत नहीं गिरी जितनी आज आंकी जा रही है! हालांकि उनके सेहत और तबियत को लेकर कई सवाल उठाए जा रहे है. उनकी उम्र की बात करें तो वह 75 साल के हो गए है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी करीब उनके ही उम्र के है. ऐसे में नीतीश को अभिभावक मंडल में जाने के लिए नैतिक आधार पर बाध्य नहीं किया जा सकता. वहीं उनकी सेहत की बात करें तो वह अपने अफसरों को डेढ़ साल पहले खुद को ही खोजवाने का आदेश-निर्देश दे रहे थे. इसका प्रसंग भी काफी रोचक है.
क्यों हो रही नीतीश के कमजोर पड़ने की चर्चा?
बता दें की नीतीश की सेहत को लेकर RJD नेता तजस्वी यादव उनके पीछे पड़ गए है. इसके अलावा प्रशांत किशोर भी यही यही कर रहे है. बिहार के 13 करोड़ आबादी के लिए दोनों उनके सेहत को खतरनाक बता रहे है. इसकी झलक 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी देखने को मिला था. नीतीश कुमार ने किसी के फ़रियाद पर गृह मंत्री को बुलांडे का आदेश दिया था. यह उनके द्वारा लगाए गए जनता दरबार का मामला है. एक बार नहीं बल्कि वह बार-बार गृह मंत्री को बुलाने का आदेश दे रहे थे. इसके बाद महिलाओं पर विधानसभा में उनके द्वारा की गई टिप्पणी को लेकर भी उनकी मानसिक स्थिति पर सवाल उठाए गए. इसके बाद उन्होंने पीएम मोदी समेत कई लोगों के पैर छूने का भी प्रयास किया. इसके अलावा नीतीश कुमार के अजीबोगरीब हरकतों को लेकर भी मानसिक तौर पर बीमार बताने की विपक्ष कोशिश करता रहा है.
भाजपा ने नहीं टूट पाती यारी
नीतोश कुमार ने पहली बार साल 2013 को भाजपा का साथ छोड़ दिया था. इसके बाद नीतीश की घृणा के कई उदाहरण नरेंद्र मोदी द्वारा सामने आ चुके थे. गुजरात का सीएम रहते हुए नरेंद्र मोदी को भाजपा ने पीएम का चेहरा घोषित कर दिया था. भाजपा को एक झटके में नीतीश ने अलविदा कह दिया था. उन्होंने सरकार जाने की भी परवाह नहीं की. ऐसे में दूसरे दलों में सरकार का संकट भांपते हुए उनका समर्थन कर दिया. इसके बाद जनता दल के दिनों के बाद यहां से नीतीश और RJD के नजदीकियों का सिलसिला शुरू हुआ. इसके बाद JDU और RJD ने महागठबंध के तौर पर बराबरी चुनाव लड़ा. इसके बाद साल 2015 में नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार में महागठबंधन की सरकार बनी. लेकिन नीतीश कुमार जो अटल बिहारी वाजपेयी पर अटूट आस्था रखते है आखिर कब तक उनके पार्टी से दूर रहते. ऐसे में साल 2017 में वह भाजपा के सहयोग से एक बार फिर से वह सीएम बन गये. साल 2020 में अगर चिराग ने लंगड़ी नहीं मरी होती तो शायद नीतीश कुमार की यह दशा नहीं होती.
नाराजगी के साथ नमो से खूब प्रेम!
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतीश कुमार से कोई नाराजगी नहीं है. बता दें कि जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री थे तब नरेंद्र मोदी को बिहार आने से रोकने वाले नीतीश कुमार ही थे. उन्होंने उनके स्वागत में दिए भोज को भी ऐन मौके पर रद्द कर दिया था. ऐसे में जब बिहार में आई बाढ़ राहत के लिए नरेंद्र मोदी ने मदद भेजी तो गुस्से में नीतीश ने राशि लौटा दी. उस समय नरेंद्र मोदी गुजरात के सीएम थे. इतना ही नहीं जब भाजपा ने साल 201 में नरेंद्र मोदी को पीएम फेस प्रोजेक्ट किया. इसके बाद उन्होंने NDA का साथ छोड़ दिया. उन्होंने सरकार जाने की भी परवाह नहीं की. हालांकि उस समय उनकी सरकार RJD और अन्य विपक्षी दलों के मदद से चलती रही. इसके बावजूद अब वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पैर छूने का प्रयास करते हुए नजर आए थे. ऐसे में मोदी भी नीतीश कुमार को पुरानी बातें भूलकर लाडला मुख्यमंत्री बताते है. इसे तो परस्पर प्रेम का परिचायक ही मानना उचित होगा.
नीतीश को है अपनी ताकत का अंदाजा
कोई कुछ भी कहे लेकिन नीतीश कुमार को अपनी ताकत का आचे से अंदाजा है. वह इस बात को बहुत अच्छे से जानते है कि उनके बिना बिहार में किसी की भी सरकार नहीं बनने वाली. साल 2020 के चुनाव में बिहार अ काफी खराब प्रदर्शन था. इसके बावजूद भी RJD और भाजपा उनके बिना सरकार में शामिल होने का सुख नहीं पा सकी. इस चुनाव में उनकी पार्टी को महज 43 सीट ही मिली थी. केवल नीतीश के बदौलत ही पहले NDA की सरकार बनी और फिर महागाथंधन को 17 महीनों के लिए सत्ता का सुख प्राप्त हो सका. बता दे कि JDU को 15-16 वोट नीतीश के नाम पर मिलते आ रहे है. ऐसे में यह कसीस की भी सरकार बनाने के लिए काफी है. इसलिए वह भाजपा द्वारा CM फेस बदल देने के बात को ज्यादा ध्यान नहीं देते है. वह इस बात को अच्छे से जानते है कि बिहार में उनके बिना किसी का कम नहीं चलने वाला.