न्यूज़11 भारत
रांची/डेस्क: झारखंड हाईकोर्ट ने CCL कर्मचारी हरिपत साव की मौत के बाद उनके बेटे मनोज कुमार को अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने की मांग से जुड़े मामले में दायर समीक्षा याचिका खारिज कर दी है. कोर्ट ने माना कि नौकरी के लिए आवेदन तय समय सीमा के बाद किया गया था और मामले में सिर्फ देरी ही नहीं, बल्कि मनोज कुमार की उम्र को लेकर भी महत्वपूर्ण विसंगति सामने आई थी. इसके अलावा, समय रहते उनका नाम ‘लाइव रोस्टर’ में शामिल कराने का भी कोई अनुरोध नहीं किया गया था.
यह फैसला जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस अनुभा रावत चौधरी की खंडपीठ ने गुरुवार को सुनाया. यह सिविल रिव्यू पिटिशन 22 नवंबर 2023 के उस फैसले के खिलाफ दाखिल की गई थी, जिसमें LPA No. 403 of 2023 को खारिज कर दिया गया था.
क्या है मामला
हरिपत साव CCL की सौंदा कोलियरी में ट्रैमर के पद पर कार्यरत थे. उनकी 10 अगस्त 2009 को सेवा के दौरान मौत हो गई थी. इसके बाद उनकी पत्नी मनजू देवी ने अपने बेटे मनोज कुमार के लिए अनुकंपा नियुक्ति की मांग करते हुए 11 जून 2011 को आवेदन दिया. यानी कर्मचारी की मौत के करीब 22 महीने बाद आवेदन किया गया.
CCL के नियम के अनुसार उस समय अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन की अधिकतम समय सीमा डेढ़ साल थी. 3 नवंबर 2009 के सर्कुलर के जरिए यह अवधि बढ़ाकर 18 महीने की गई थी. इस मामले में आवेदन निर्धारित समय से करीब चार महीने बाद किया गया था.
पहले भी कोर्ट पहुंचा था मामला
देरी के आधार पर 12 दिसंबर 2012 को आवेदन खारिज कर दिया गया था. इसके बाद परिवार ने हाईकोर्ट का रुख किया. 2016 में हाईकोर्ट की एकल पीठ ने पुराने आदेश को रद्द करते हुए मामले पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया. इसके बाद मामला फिर अधिकारियों के पास गया, लेकिन 20 नवंबर 2017 को अनुकंपा नियुक्ति का दावा दोबारा खारिज कर दिया गया.
इसके बाद दायर W.P.(S) No. 2198 of 2018 को 1 मई 2023 को खारिज कर दिया गया. इसके खिलाफ LPA No. 403 of 2023 दाखिल की गई, जिसे 22 नवंबर 2023 को खारिज कर दिया गया. इसके बाद अब समीक्षा याचिका दायर की गई थी.
उम्र के रिकॉर्ड में बड़ी गड़बड़ी बना बड़ा कारण
हाईकोर्ट ने पाया कि CCL के रिकॉर्ड में मृत कर्मचारी ने अपने बेटे मनोज कुमार की उम्र 20 सितंबर 2002 को आठ साल बताई थी. वहीं, नौकरी के लिए आवेदन करने वाले मनोज कुमार ने अपनी जन्मतिथि 15 अगस्त 1987 बताई. कोर्ट ने कहा कि दोनों रिकॉर्ड में काफी अंतर है और इसी वजह से अधिकारियों ने उनकी उम्मीदवारी को संदिग्ध माना था.
कोर्ट ने यह भी माना कि यदि कर्मचारी की ओर से दर्ज आठ वर्ष की उम्र को सही माना जाए तो पिता की मृत्यु के समय मनोज कुमार नाबालिग थे. ऐसे में उनका नाम ‘लाइव रोस्टर’ में दर्ज कराने के लिए भी कोई कदम नहीं उठाया गया था. दूसरी ओर, उनके अपने रिकॉर्ड के अनुसार वह पिता की मृत्यु के समय बालिग थे और तय समय में खुद आवेदन कर सकते थे.
कोर्ट ने कहा- सिर्फ देरी नहीं, कई कारणों से खारिज हुआ दावा
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति का दावा केवल आवेदन में देरी के आधार पर ही खारिज नहीं हुआ था. अधिकारियों ने मनोज कुमार की उम्र में विसंगति, लाइव रोस्टर में नाम दर्ज नहीं कराने और निर्धारित समय सीमा बीत जाने समेत कई कारणों को आधार बनाया था. पहले की सुनवाई में इन सभी पहलुओं पर विचार किया जा चुका था.
कोर्ट ने कहा कि जिन पुराने फैसलों का हवाला देकर समीक्षा की मांग की गई, वे इस मामले के तथ्यों पर लागू नहीं होते. पुराने मामले में आवेदन समय पर किए जाने का दावा था, जबकि वर्तमान मामले में आवेदन तय अवधि से बाहर किया गया था और देरी का कारण भी अधिकारियों ने स्वीकार नहीं किया था. खंडपीठ ने कहा कि इस मामले में ऐसा कोई आधार नहीं है, जिसके कारण पहले के फैसले की समीक्षा की जाए.
यह भी पढ़ें- एक अभिभावक के जन्मदिवस के रूप में भव्य तरीके से मनाना है PM मोदी का जन्मदिन: डॉ संजय जायसवाल