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35 वर्षों में 1089 से अधिक लोगों की आंखों में लौटी रोशनी, झारखंड में नेत्रदान अभियान बना मिसाल

झारखंड में नेत्रदान और कॉर्निया प्रत्यारोपण के क्षेत्र में पिछले तीन दशकों से अधिक समय में उल्लेखनीय प्रगति देखने को मिली है. लगातार जागरूकता अभियानों, चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार और समाज की भागीदारी

By : Ark Sahuliyar
35 वर्षों में 1089 से अधिक लोगों की आंखों में लौटी रोशनी, झारखंड में नेत्रदान अभियान बना मिसाल

न्यूज11 भारत
रांची/डेस्क:
राज्य में 1089 सफल कॉर्निया प्रत्यारोपण के माध्यम से हजारों लोगों के जीवन में प्रकाश लौटाया जा चुका है, यह उपलब्धि 35 वर्षों के अथक प्रयास, समर्पण और समाज के सहयोग का परिणाम है. वर्ष 1991 में शुरू हुआ यह अभियान आज एक सशक्त जन-आंदोलन का रूप ले चुका है, जिसने नेत्रदान के प्रति लोगों की सोच को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

1991 : एक विचार जिसने बदलाव की नींव रखी
डॉ. भारती कश्यप और डॉ. बी.पी. कश्यप ने वर्ष 1991 में अविभाजित बिहार और वर्तमान झारखंड में नेत्रदान को लेकर लोगों के बीच अनेक भ्रांतियाँ की चुनौती को अवसर में बदलने का संकल्प लिया. उन्होंने नेत्रदान के प्रति जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से व्यापक अभियान की शुरुआत की.

इस मिशन को मजबूत आधार देने के लिए इस मिशन को एक मजबूत आधार देने के लिए डॉ. बी. पी. कश्यप ने जापान के प्रसिद्ध कॉर्निया प्रत्यारोपण विशेषज्ञ डॉ. अकीरा मोमोसे और डॉ. भारती कश्यप ने हैदराबाद के प्रतिष्ठित एल. वी. प्रसाद आई इंस्टीट्यूट से विशेष प्रशिक्षण प्राप्त किया. आधुनिक तकनीकों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ उन्होंने झारखंड में कॉर्निया प्रत्यारोपण सेवाओं की नींव रखी.निरंतर जनसंपर्क, जागरूक कार्यक्रमों और सामाजिक संवाद के माध्यम से इस अभियान को आगे बढ़ाया गया.

1996 : पहला नेत्रदान और इतिहास का निर्माण
लगातार पांच वर्षों तक किए गए जनजागरूकता प्रयासों का परिणाम जनवरी 1996 में सामने आया, जब झारखंड को पहला ऐतिहासिक मरणोपरांत नेत्रदान प्राप्त हुआ. इस नेत्रदान के माध्यम से दो कॉर्नियल अंधतत्व से पीड़ित व्यक्तियों का सफल एवं निःशुल्क कॉर्निया प्रत्यारोपण किया गया. इन सफल प्रत्यारोपणों ने न केवल चिकित्सा क्षेत्र में एक नया अध्याय लिखा, बल्कि समाज में यह संदेश भी दिया कि नेत्रदान मृत्यु के बाद भी किसी के जीवन में प्रकाश ला सकता है.

2002 : कश्यप मेमोरियल आई बैंक की स्थापना
नेत्रदान अभियान को संस्थागत स्वरूप प्रदान करने के उद्देश्य से वर्ष 2002 में कश्यप मेमोरियल आई बैंक की स्थापना की गई. बाद में इस संस्थान को आई बैंक एसोसिएशन ऑफ इंडिया (EBAI) की सदस्यता भी प्राप्त हुई, जिससे इसकी विश्वसनीयता और कार्यक्षमता को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली.

आज डॉ. भारती कश्यप मेडिकल डायरेक्टर तथा डॉ. बी.पी. कश्यप एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर के रूप में इस मिशन का नेतृत्व कर रहे हैं. डॉ. निधि गडकर कश्यप के नेतृत्व में तथा एम्स, नई दिल्ली से प्रशिक्षित डॉ. विशाल कुमार सहित कॉर्निया प्रत्यारोपण विशेषज्ञों की टीम आधुनिक तकनीकों के माध्यम से कॉर्निया प्रत्यारोपण सेवाओं को निरंतर आगे बढ़ाकर राष्ट्रीय स्तर पर एक विशिष्ट पहचान दिलाई है.

जागरूकता से जन-आंदोलन तक की यात्रा
पिछले 35 वर्षों में यह अभियान केवल चिकित्सा सेवा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन के रूप में विकसित हुआ. हजारों लोगों ने नेत्रदान का संकल्प लिया और समाज में नेत्रदान के प्रति सकारात्मक सोच विकसित हुई. स्कूलों, कॉलेजों, सामाजिक संस्थाओं और विभिन्न जनजागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों को नेत्रदान के महत्व से अवगत कराया गया.
 इस अभियान का सबसे बड़ा परिणाम यह रहा कि अब तक 1089 कॉर्नियल अंधत्तव से पीड़ित मरीजों को नई दृष्टि मिल चुकी है. जिन लोगों ने वर्षों तक अंधकार में जीवन बिताया, उन्हें फिर से दुनिया देखने का अवसर मिला. 

रन फॉर विजन और ब्लाइंडफोल्ड मैराथन
नेत्रदान के संदेश को जन-जन तक पहुँचाने के लिए पिछले दो दशकों से "रन फॉर विजन" और अनूठी "ब्लाइंडफोल्ड मैराथन" का आयोजन किया जा रहा है. इन आयोजनों की विशेषता यह है कि इनमें प्रतिभागियों को दृष्टिहीन व्यक्तियों के जीवन की चुनौतियों का अनुभव कराया जाता है. इससे लोगों में न केवल जागरूकता बढ़ती है, बल्कि दृष्टिबाधित व्यक्तियों के प्रति संवेदनशीलता भी विकसित होती है.

एक प्रेरक विरासत
35 वर्षों की यह यात्रा इस बात का प्रमाण है कि दृढ़ संकल्प, सामाजिक जागरूकता और निरंतर प्रयासों के माध्यम से किसी भी सकारात्मक विचार को जन-आंदोलन में बदला जा सकता है. झारखंड में नेत्रदान अभियान ने न केवल 1089 लोगों के जीवन में प्रकाश लौटाया है, बल्कि हजारों परिवारों को यह संदेश भी दिया है कि मृत्यु के बाद भी जीवनदान संभव है. यह आंदोलन चिकित्सा सेवा, सामाजिक उत्तरदायित्व और मानवीय संवेदनाओं की ऐसी प्रेरक विरासत है, जो आने वाली पीढ़ियों को भी समाज सेवा के लिए प्रेरित करती रहेगी.

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