बैंक मैनेजर को बड़ी राहत

3 हजार रुपये रिश्वत मामले में बैंक मैनेजर को बड़ी राहत, हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि और सजा की रद्द

झारखंड हाईकोर्ट ने करीब 24 साल पुराने रिश्वत मामले में तत्कालीन क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, हुड़दा शाखा के मैनेजर बिलोकन बारा को बड़ी राहत दी है.

By : Ark Sahuliyar
3 हजार रुपये रिश्वत मामले में बैंक मैनेजर को बड़ी राहत, हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि और सजा की रद्द

न्यूज़11 भारत 
रांची/डेस्क:
झारखंड हाईकोर्ट ने करीब 24 साल पुराने रिश्वत मामले में तत्कालीन क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, हुड़दा शाखा के मैनेजर बिलोकन बारा को बड़ी राहत दी है. न्यायाधीश प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने ट्रायल कोर्ट के दोषसिद्धि और सजा के आदेश को रद्द करते हुए उनकी अपील स्वीकार कर ली. हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष रिश्वत की मांग और उसे अवैध रूप से स्वीकार किए जाने की मूल शर्त को पर्याप्त रूप से साबित नहीं कर सका.

आटा चक्की चलाने के लिए 3 हजार रुपये मांगने का आरोप
मामला वर्ष 2002 का है. क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक की हुड़दा शाखा से एक व्यक्ति को आटा चक्की चलाने के लिए 25 हजार रुपये का ऋण दिया गया था. शिकायतकर्ता इस ऋण में गारंटर था. आरोप था कि आटा चक्की चलाने को लेकर बैंक मैनेजर बिलोकन बारा ने उससे 3 हजार रुपये की रिश्वत मांगी थी.

शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि 29 नवंबर 2002 को मैनेजर उसके घर पहुंचे और 7 दिसंबर तक 3 हजार रुपये देने की मांग की. पैसे नहीं देने पर केस में फंसाने और जेल भेजने की धमकी देने का भी आरोप लगाया गया. इसके बाद शिकायतकर्ता ने सीबीआई से शिकायत की. सत्यापन के बाद सीबीआई ने मामला दर्ज कर ट्रैप की कार्रवाई की.

सीबीआई ट्रैप में 3 हजार रुपये देने का दावा
4 दिसंबर 2002 को सीबीआई की टीम ने ट्रैप लगाया. अभियोजन के अनुसार, शिकायतकर्ता ने बैंक शाखा में जाकर बिलोकन बारा को 3 हजार रुपये दिए. आरोप है कि मैनेजर ने रकम दोनों हाथों से गिनी और अपने टेबल पर रख ली. इसके बाद सीबीआई टीम ने मौके पर पहुंचकर उन्हें पकड़ लिया. हाथों को सोडियम कार्बोनेट के घोल से धोने पर रंग गुलाबी होने की बात भी रिकॉर्ड में आई.

ट्रायल कोर्ट ने मामले में अभियोजन के साक्ष्यों के आधार पर बिलोकन बारा को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 तथा धारा 13(2) सहपठित धारा 13(1)(d) के तहत दोषी ठहराया था. धारा 7 में दो साल और धारा 13(2) के मामले में ढाई साल के कठोर कारावास के साथ जुर्माने की सजा सुनाई गई थी. दोनों सजाएं साथ-साथ चलनी थीं.

हाईकोर्ट ने कहा- रिश्वत की मांग साबित नहीं हुई
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और गवाहों के बयानों की विस्तार से समीक्षा की. अदालत ने पाया कि ट्रैप के प्रमुख गवाह शिकायतकर्ता देव प्रसाद साहू और शैडो विटनेस लाखो तिर्की ने ऐसा स्पष्ट बयान नहीं दिया, जिससे यह साबित हो कि बैंक मैनेजर ने अवैध रिश्वत की मांग की थी.

अदालत ने यह भी पाया कि शिकायतकर्ता बैंक के ऋण से जुड़ी आटा चक्की खुद चला रहा था, जबकि वह मूल ऋण लेने वाला व्यक्ति नहीं बल्कि गारंटर था. रिकॉर्ड में यह भी आया कि उसने लंबे समय तक ऋण की किस्त का भुगतान नहीं किया था. हाईकोर्ट ने इन परिस्थितियों को शिकायतकर्ता की भूमिका और उसकी शिकायत की विश्वसनीयता के आकलन में महत्वपूर्ण माना.

सिर्फ रकम बरामद होना पर्याप्त नहीं
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि भ्रष्टाचार के मामले में केवल रकम की बरामदगी से अपराध साबित नहीं होता. अभियोजन को रिश्वत की मांग और स्वीकार किए जाने को कानून के मुताबिक साबित करना जरूरी है. अदालत ने माना कि इस मामले में यह बुनियादी आवश्यकता पूरी तरह साबित नहीं हुई.

अदालत ने यह भी कहा कि सीबीआई की प्रारंभिक जांच में पर्याप्त जांच नहीं की गई थी. इन परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने मामले के साक्ष्यों का सही तरीके से मूल्यांकन नहीं किया था.

ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द
इन सभी तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के दोषसिद्धि और सजा के आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया. अदालत ने अपील स्वीकार कर ली. बिलोकन बारा पहले से जमानत पर थे, इसलिए उन्हें जमानत बांड की जिम्मेदारी से भी मुक्त कर दिया गया और जमानतदारों को भी डिस्चार्ज कर दिया गया.

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