न्यूज़11 भारत
रांची/डेस्क: झारखंड हाईकोर्ट ने धनबाद के एक वैवाहिक विवाद में पति की ओर से दायर तलाक की अपील खारिज कर दी है. कोर्ट ने कहा कि केवल पत्नी का अलग रहना अपने आप में डेजर्शन (परित्याग) नहीं माना जा सकता. न्यायाधीश सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायाधीश प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने कहा कि पति को यह साबित करना होगा कि पत्नी ने बिना उचित कारण, उसकी इच्छा के विरुद्ध और स्थायी रूप से वैवाहिक संबंध खत्म करने के इरादे से उसे छोड़ा है. पति ने धनबाद फैमिली कोर्ट के उस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उसकी ओर से दायर तलाक की याचिका खारिज कर दी गई थी.
2016 में हुई थी शादी, एक बेटा भी है
दोनों की शादी 11 जून 2016 को हुई थी और शादी का रजिस्ट्रेशन गोविंदपुर के सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में कराया गया था. शादी के बाद पत्नी धनबाद स्थित ससुराल गई और दोनों साथ रहने लगे. इस दौरान उनके एक बेटे का जन्म हुआ. पति का आरोप था कि 17 अगस्त 2017 को पत्नी अपनी इच्छा से ससुराल छोड़कर मायके चली गई और उसके बाद वापस नहीं आई. पति ने इसे परित्याग बताते हुए स्पेशल मैरिज एक्ट की धाराओं के तहत तलाक की मांग की थी.
पत्नी बोली- पति ने खुद मायके छोड़ा
पत्नी ने पति के आरोपों से इनकार किया. उसका कहना था कि शादी के कुछ समय बाद पति उसे मायके में छोड़कर चला गया था. बेटे के जन्म के बाद उसने पति से उसे और बच्चे को साथ रखने का अनुरोध किया, लेकिन पति ने बाद में ले जाने का भरोसा दिया लेकिन ले नहीं गया.
पत्नी के अनुसार 2019 में पति उसे अपने साथ ले गया था और कोर्ट के सामने एक बॉन्ड देकर पत्नी और बच्चे को सम्मान के साथ रखने का भरोसा दिया था. लेकिन अगले ही दिन पति ड्यूटी पर चला गया और इसके बाद वह मायके लौट गई. पत्नी ने कोर्ट में यह भी कहा कि वह आज भी पति के साथ रहने के लिए तैयार है.
पति क्रूरता का आरोप भी साबित नहीं कर सका
हाईकोर्ट ने पति की ओर से लगाए गए क्रूरता के आरोपों की भी जांच की. कोर्ट ने पाया कि पति ने अपनी गवाही में पत्नी द्वारा क्रूरता किए जाने की सामान्य बात कही, लेकिन कोई ऐसी ठोस घटना नहीं बताई, जिससे क्रूरता का आरोप साबित हो सके. पति की ओर से पेश अन्य गवाहों ने भी मुख्य रूप से उसी बात को दोहराया.
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि पति ने खुद माना था कि विवाद के बावजूद उसने पत्नी को 4-5 बार वापस अपने साथ ले जाने का प्रयास किया था. पत्नी के भरण-पोषण के मामले में उसे और उसके बेटे के लिए मासिक भरण-पोषण की राशि भी तय की गई थी.
पत्नी साथ रहने को तैयार, इसलिए परित्याग का आरोप नहीं माना
हाईकोर्ट ने पाया कि पत्नी ने लगातार अपने पति के साथ वैवाहिक जीवन बिताने की इच्छा जताई है. यहां तक कि हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान भी उसके अधिवक्ता ने निर्देश के आधार पर कहा कि वह पति के साथ रहने के लिए तैयार है, हालांकि दोनों के बीच मध्यस्थता सफल नहीं हो सकी.
अदालत ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों से यह सामने आता है कि पत्नी का पति से अलग रहना स्वैच्छिक नहीं बल्कि परिस्थितियों से मजबूर था. इसलिए इसे पति का परित्याग नहीं माना जा सकता. हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले में कोई कानूनी या तथ्यात्मक गलती नहीं पाई और तलाक की मांग वाली अपील खारिज कर दी.
यह भी पढ़ें- पति ने मांगा तलाक, हाईकोर्ट ने कहा- सामान्य वैवाहिक मतभेद क्रूरता नहीं, याचिका खारिज