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रांची/डेस्क: झारखंड हाईकोर्ट ने करीब 23 साल पुराने रेप के मामले में दोषी कडू लोहरा की अपील खारिज कर दी है. कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई 7 साल की सजा को बरकरार रखा है. न्यायाधीश प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की कोर्ट ने कहा कि पीड़िता की गवाही भरोसेमंद है और मेडिकल रिपोर्ट से भी उसकी बात की पुष्टि होती है. ऐसे मामले में केवल पीड़िता की विश्वसनीय गवाही के आधार पर भी दोषी को सजा दी जा सकती है.
खेत में काम कर रही थी पीड़िता, तभी पहुंचा दोषी
मामला 8 अप्रैल 2003 का है. फैसले के अनुसार, दोपहर करीब 12 बजे पीड़िता अपनी बाड़ी में सब्जियों की देखभाल कर रही थी. इसी दौरान कड़ू लोहरा वहां पहुंचा. अभियोजन के अनुसार, उसने चाकू दिखाकर पीड़िता को लेटने के लिए कहा. विरोध करने पर उसने उसे जमीन पर गिरा दिया और उसके साथ दुष्कर्म किया. फैसले में दर्ज है कि दुष्कर्म दो बार किए जाने का आरोप था और घटना के बाद पीड़िता के कपड़े खून से लाल हो गए थे. आरोपी ने उसे घटना के बारे में बताने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी भी दी थी.
घटना के बाद पीड़िता घर पहुंची और अपनी भाभी को घटना के बारे में बताया. बाद में ग्रामीणों को घटना की जानकारी हुई और उन्होंने आरोपी को पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया. इसके बाद कर्रा थाना कांड संख्या 21/2003 दर्ज किया गया. जांच पूरी होने के बाद आरोपी के खिलाफ IPC की धारा 376 के तहत चार्जशीट दाखिल की गई
मेडिकल जांच में भी मिले अहम सबूत
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने कुल 7 गवाह पेश किए. पीड़िता की मेडिकल जांच करने वाले डॉक्टर ने भी अदालत में गवाही दी.
मेडिकल रिपोर्ट में हाल में शारीरिक संबंध के संकेत और चोट के निशान मिलने की बात दर्ज थी. डॉक्टर ने पीड़िता की उम्र करीब 16 साल बताई थी. एक्स-रे जांच में भी उसकी उम्र करीब 16 वर्ष बताई गई.
आरोपी ने कहा- पुरानी दुश्मनी में फंसाया गया
हाईकोर्ट में दोषी की ओर से कहा गया कि उसे पुरानी दुश्मनी के कारण झूठे मामले में फंसाया गया है. बचाव पक्ष ने पीड़िता की गवाही में विरोधाभास का भी दावा किया. खास तौर पर यह दलील दी गई कि पीड़िता ने पहले चाकू दिखाने की बात कही, जबकि जिरह में उसने कहा कि उसने चाकू नहीं देखा था.
राज्य सरकार की ओर से इन दलीलों का विरोध किया गया. सरकार ने कहा कि पीड़िता की गवाही स्पष्ट है और मेडिकल रिपोर्ट से भी उसे समर्थन मिलता है.
हाईकोर्ट ने कहा- पीड़िता की गवाही भरोसेमंद
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और दोनों पक्षों की दलीलों को देखने के बाद कहा कि पीड़िता ने घटना के बारे में स्पष्ट रूप से बताया है. उसकी गवाही को मेडिकल सबूत से भी समर्थन मिलता है.
कोर्ट ने कहा कि केवल इसलिए कि कोई स्वतंत्र गवाह घटना की पुष्टि नहीं करता, अभियोजन का मामला कमजोर नहीं हो जाता. यदि पीड़िता की गवाही भरोसेमंद है तो उसके आधार पर दोषसिद्धि की जा सकती है.
7 साल की सजा बरकरार, दो महीने में सरेंडर का आदेश
हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले में कोई कानूनी गलती नहीं पाई और दोषी की अपील खारिज कर दी. इस तरह रेप के मामले में 7 साल की कठोर जेल की सजा बरकरार रही. फिलहाल दोषी जमानत पर था. कोर्ट ने उसका जमानत बांड रद्द करते हुए उसे दो महीने के भीतर ट्रायल कोर्ट में सरेंडर करने का आदेश दिया है.
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