नीरज कुमार साहू/न्यूज11 भारत
बसिया/डेस्क: ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक बदलाव और महिला सशक्तिकरण को लेकर 'प्रदान' संस्था की जेंडर सीआरपी (कम्युनिटी रिसोर्स पर्सन) दीदियों ने एक अनूठी मिसाल पेश की है. बसिया ब्लॉक के गाँव-गाँव में बंद हो चुके या टूटे हुए महिला मंडलों और ग्राम संगठनों को फिर से सक्रिय कर दीदियों ने महिलाओं के लिए स्वावलंबन और न्याय का नया रास्ता खोल दिया है.
इस मुहिम के तहत न सिर्फ महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त हो रही हैं, बल्कि सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज भी बुलंद कर रही हैं.
नुक्कड़ नाटक और गीतों से कुरितियों पर प्रहार
जागरूकता फैलाने के लिए सीआरपी दीदियों ने पारंपरिक तरीकों को छोड़कर नए और प्रभावी माध्यमों को चुना है. गाँवों में नुक्कड़ नाटक, प्रेरणादायक गीत, रैलियों और खेल-कूद के जरिए सीधे संवाद स्थापित किया जा रहा है. इन कार्यक्रमों में महिला हिंसा, बाल विवाह और डायन प्रथा जैसे गंभीर व संवेदनशील मुद्दों पर खुलकर बात की जा रही है.
इस जागरूकता का ही परिणाम है कि अब पीड़ित महिलाएं चुप रहने के बजाय अपने अधिकारों के लिए आगे आ रही हैं. वे बसिया स्थित 'गरिमा केंद्र' में बेझिझक आवेदन कर रही हैं, जहाँ उनकी समस्याओं के समाधान के लिए तुरंत कानूनी व प्रशासनिक कार्रवाई की जाती है.
चारदीवारी तोड़कर आर्थिक स्वावलंबन की ओर बढ़े कदम
'सफलता परियोजना' के अंतर्गत सीआरपी दीदियों ने उन ग्रामीण महिलाओं तक अपनी पहुंच बनाई है, जिन्हें पहले घर से बाहर निकलने की भी इजाजत नहीं थी. इन महिलाओं को विशेष ट्रेनिंग दी गई और उनके हुनर को प्रदर्शित करने के लिए एक मंच (प्लेटफॉर्म) प्रदान किया गया.
पहले जो महिलाएं अपनी प्रतिभा को मन में ही दबाए रखती थीं, वे अब स्वयं सहायता समूहों (SHG) से जुड़कर सामूहिक रूप से काम कर रही हैं. इससे न केवल उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है, बल्कि उनके जीवन स्तर और आजीविका में भी बड़ा सुधार आया है.
'प्रदान' संस्था के सहयोग से चलाई जा रही यह अनूठी पहल आज पूरे बसिया ब्लॉक में महिला सशक्तिकरण का एक जीता-जागता उदाहरण बन चुकी है. घूंघट और चारदीवारी से निकलकर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते महिलाओं के ये कदम ग्रामीण समाज की एक नई और प्रगतिशील तस्वीर बयां कर रहे हैं.
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