संतोष कुमार श्रीवास्तव/न्यूज 11 भारत
पलामू /डेस्क: झारखंड के पलामू जिले के हैदरनगर में नवरात्र के दौरान आयोजित होने वाला "भूत मेला" एक अनूठा आयोजन है, जो आगंतुकों के मन में कई सवाल खड़े करता है. क्या यह मेला गहरी आस्था की अभिव्यक्ति है, या फिर अंधविश्वास की पराकाष्ठा? यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यह आयोजन नवरात्रि जैसे पवित्र समय में होता है, जो देवी की आराधना और सकारात्मकता का प्रतीक है . इस विरोधाभास के कारण, इस मेले का विश्लेषण करना आवश्यक हो जाता है ताकि इसकी जटिलताओं को समझा जा सके.
हैदरनगर का भूत मेला
हैदरनगर का यह मेला पलामू जिले में स्थित है, जो जिला मुख्यालय डाल्टेनगंज से लगभग 85 से 90 किलोमीटर की दूरी पर है . इस मेले का केंद्र हैदरनगर देवी धाम मंदिर परिसर है, जो इस आयोजन का मुख्य स्थल है . मंदिर परिसर में एक प्राचीन वृक्ष भी मौजूद है, जिसके बारे में मान्यता है कि इसमें हजारों कीलें ठोंकी गई हैं, जिनके माध्यम से भूतों और प्रेतों को कैद किया गया है . इसके अतिरिक्त, देवी धाम के परिसर में एक जिन बाबा की मजार भी स्थित है, जिसे स्थानीय लोग नकारात्मक आध्यात्मिक शक्तियों को दूर करने में सहायक मानते हैं . इस प्रकार, मेले का भौतिक और धार्मिक परिवेश कई विशिष्टताओं से भरा हुआ है. देवी धाम मंदिर और प्राचीन वृक्ष की केंद्रीय भूमिका स्पष्ट है, और जिन बाबा की मजार की उपस्थिति स्थानीय धार्मिक मान्यताओं की एक दिलचस्प परत जोड़ती है. यह सह-अस्तित्व विभिन्न धार्मिक परंपराओं के संभावित मिश्रण और स्थानीय सांस्कृतिक परिदृश्य पर उनके प्रभाव को इंगित करता है, जो "भूत मेला" की प्रकृति और व्याख्या को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक हो सकता है. विशेष रूप से प्राचीन वृक्ष और कीलों से जुड़ी लोककथाएं, मंदिर में प्रचलित अधिक मुख्यधारा की हिंदू प्रथाओं के साथ सह-अस्तित्व में, समुदाय के भीतर आत्माओं की दुनिया को समझने और उससे बातचीत करने के एक अद्वितीय तरीके का प्रतिनिधित्व करती हैं.
साल में दो बार आयोजित होता है यह मेला
यह मेला साल में दो बार आयोजित होता है, एक बार शारदीय नवरात्र में और दूसरी बार चैत्र नवरात्र में . यह दोनों ही नवरात्र पूरे नौ दिनों तक चलते हैं, और इस दौरान हैदरनगर देवी धाम मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है . मेले की प्राथमिक गतिविधियों में देवी की पूजा-अर्चना करना, मन्नतें मांगना, और भूत-प्रेत बाधा से मुक्ति के लिए "ओझा गुनियों" द्वारा किए जाने वाले झाड़-फूंक में शामिल होना शामिल है . "झाड़ फूंक" इस मेले का एक केंद्रीय अनुष्ठान है, जिसमें अक्सर भूत-प्रेत से पीड़ित माने जाने वाले लोग झूमते, नाचते और अन्य शारीरिक क्रियाएं करते हुए दिखाई देते हैं . मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के रहने के लिए अस्थायी तंबू और शिविर भी लगाए जाते हैं . नवरात्र के साथ मेले का लगातार समय पर होना इस अनूठे आयोजन और व्यापक हिंदू धार्मिक कैलेंडर के बीच एक मजबूत संबंध को दर्शाता है. वर्ष में दो बार इसका आयोजन समुदाय की आध्यात्मिक प्रथाओं में इसके स्थायी महत्व को इंगित करता है. "झाड़ फूंक" की प्रमुखता और इन अनुष्ठानों में उपस्थित लोगों की सक्रिय भागीदारी, जिसमें अक्सर स्पष्ट शारीरिक अभिव्यक्तियाँ शामिल होती हैं, इस परंपरा के अनुभवात्मक और प्रदर्शनकारी पहलुओं को उजागर करती हैं. यह इंगित करता है कि "भूत मेला" केवल निष्क्रिय पूजा के बारे में नहीं है, बल्कि कथित आध्यात्मिक शक्तियों के साथ सक्रिय जुड़ाव के बारे में भी है. अस्थायी आश्रयों से पता चलता है कि उपस्थित लोग नौ दिवसीय त्योहार के दौरान विस्तारित अवधि के लिए अक्सर रुकते हैं, जो अनुष्ठानों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता और समान राहत चाहने वालों के बीच समुदाय की संभावित भावना को दर्शाता है. यह अस्थायी बस्ती मेले के दौरान मंदिर परिसर के भीतर एक अद्वितीय सामाजिक वातावरण भी बनाती है.
इस मेले में भाग लेने वाले लोगों की मुख्य प्रेरणा भूत-प्रेत जैसी नकारात्मक आध्यात्मिक शक्तियों से मुक्ति और सुरक्षा प्राप्त करना है . उनकी हैदरनगर देवी धाम और इसकी देवी में गहरी आस्था है, और वे मानते हैं कि यहां पूजा-अर्चना करने से उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं, खासकर आध्यात्मिक कल्याण से संबंधित . मेले में मौजूद "ओझा गुनियों" की क्षमता में भी उनका विश्वास है कि वे अपने पारंपरिक तरीकों और "तंत्र मंत्र" के माध्यम से प्रभावी रूप से भूत-प्रेत बाधा दूर कर सकते हैं . इसके अतिरिक्त, यह विशेष मान्यता है कि प्राचीन वृक्ष, जिसमें कीलें ठोंकी गई हैं, बुरी आत्माओं को फंसाने का स्थान है, जो मुक्ति चाहने वालों के लिए एक प्रतीकात्मक या वास्तविक विमोचन प्रदान करता है . "भूत मेला" में भाग लेने की प्राथमिक प्रेरणा बुरी आत्माओं के अस्तित्व और देवी और "ओझा गुनियों" की प्रभावी उपचार प्रदान करने की कथित शक्ति में गहराई से निहित विश्वास प्रतीत होती है. यह आध्यात्मिक संकट को दूर करने के लिए पारंपरिक मान्यताओं और प्रथाओं पर एक मजबूत निर्भरता को उजागर करता है. यह तथ्य कि लोग कई राज्यों से यात्रा करते हैं, इस विशिष्ट मेले और इससे जुड़े अनुष्ठानों की प्रभावकारिता में व्यापक विश्वास का सुझाव देता है, जो शायद उनके अपने क्षेत्रों में उपचार या आध्यात्मिक मार्गदर्शन के वैकल्पिक रूपों में विश्वास की कमी या पहुंच की कमी को दर्शाता है. यह मजबूत सामाजिक नेटवर्क और साझा सांस्कृतिक विश्वासों की ओर भी इशारा कर सकता है जो लोगों को हैदरनगर की ओर आकर्षित करते हैं. कुछ "ओझा गुनियों" द्वारा लिए जाने वाले शुल्क प्रेरणाओं में एक आर्थिक पहलू का परिचय देते हैं. जबकि विश्वास निस्संदेह एक प्राथमिक चालक है, एक लेन-देन संबंधी पहलू की उपस्थिति शोषण की संभावना और इस परंपरा के भीतर वास्तविक विश्वास-आधारित प्रथाओं और आर्थिक प्रोत्साहनों के जटिल अंतःक्रिया के बारे में सवाल उठाती है. कई लोग "भूत मेला" को गहरी आस्था की अभिव्यक्ति मानते हैं. हजारों श्रद्धालु हैदरनगर देवी के प्रति गहरी भक्ति रखते हैं और मानते हैं कि उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और उन्हें सुरक्षा मिलती है .
रवींद्र कुमार जैसे व्यक्तियों द्वारा दिए गए उपाख्यानात्मक साक्ष्य, जो दावा करते हैं कि मेले में नियमित रूप से आने और देवी की पूजा करने के बाद उनके परिवार की भलाई में सुधार हुआ है, इस विश्वास को और मजबूत करते हैं . मंदिर के मुख्य पुजारी (त्यागी जी महाराज) के कथन, जो पुष्टि करते हैं कि हैदरनगर में देवी की पूजा करने से सभी इच्छाएं पूरी होती हैं और यह परिसर एकता और सद्भाव का प्रतीक है, इस दृष्टिकोण को और समर्थन देते हैं . देवी की पूजा करने आने वालों द्वारा जिन बाबा की मजार पर प्रार्थना (फातेहा) करने की परंपरा मंदिर परिसर के भीतर एक व्यापक आध्यात्मिक श्रद्धा का सुझाव देती है . नवरात्र मेलों के दौरान मंदिर द्वारा उत्पन्न महत्वपूर्ण राजस्व, जिसका उपयोग मंदिर के विकास और भक्तों को सुविधाएं प्रदान करने के लिए किया जाता है, इस धार्मिक स्थल में एक सामुदायिक निवेश को इंगित करता है . इन सभी पहलुओं से पता चलता है कि "भूत मेला" में भाग लेने वाले कई लोगों के लिए यह वास्तव में गहरी आस्था का मामला है. हैदरनगर देवी में हजारों भक्तों की अटूट श्रद्धा और "भूत मेला" में भाग लेने और प्रार्थना करने से इच्छाओं की पूर्ति और दुख से मुक्ति, जिसमें कथित आध्यात्मिक कष्ट भी शामिल हैं, में उनका दृढ़ विश्वास इस आयोजन के पीछे एक शक्तिशाली प्रेरक शक्ति है. हिंदू भक्तों द्वारा जिन बाबा की मजार को शामिल करना और फातेहा अर्पित करना इस क्षेत्र में प्रचलित एक अद्वितीय प्रकार के समन्वयवादी विश्वास का सुझाव देता है. यह इंगित करता है कि आध्यात्मिकता की स्थानीय समझ अधिक समावेशी और सख्त धार्मिक सीमाओं से कम बंधी हो सकती है. मंदिर का आर्थिक पहलू और इसके विकास और सुविधाओं में धन का पुनर्निवेश समुदाय के विश्वास को और मजबूत कर सकता है, क्योंकि वे अपने धार्मिक जुड़ाव और योगदान से सीधे उत्पन्न होने वाले मूर्त लाभ और सुधार देखते हैं. यह उनके विश्वास को मंदिर की शक्ति और महत्व में सुदृढ़ करने वाला एक सकारात्मक प्रतिपुष्टि चक्र बनाता है.
हालांकि, आधुनिक वैज्ञानिक समझ के संदर्भ में, "भूत मेला" को अंधविश्वास का प्रतीक मानने वाले प्रतिवाद और आलोचनाएं भी मौजूद हैं. भूत और आत्माओं में विश्वास और तर्कसंगत विचार और वैज्ञानिक व्याख्या के सिद्धांतों के बीच एक अंतर्निहित विरोधाभास है .
पुलिस प्रशासन से सुरक्षा मिलती इस मेले को
यह विडंबना है कि जहां झारखंड में जादू टोना और "डायन शिकार" से संबंधित प्रथाओं के खिलाफ सख्त कानून हैं, वहीं आत्माओं में विश्वास और भूत-प्रेत बाधा दूर करने के अनुष्ठानों पर केंद्रित इस मेले को पुलिस प्रशासन से सुरक्षा मिलती है . मेले में चिकित्सा शिविरों या अंधविश्वास के खिलाफ जागरूकता अभियानों की स्पष्ट अनुपस्थिति भी ध्यान देने योग्य है, जबकि बड़ी संख्या में लोग कथित आध्यात्मिक बीमारियों के उपचार की तलाश में एकत्र होते हैं . "ओझा गुनियों" द्वारा "तंत्र मंत्र" के माध्यम से भूत-प्रेत बाधा दूर करने की उनकी क्षमता के दावे में वैज्ञानिक प्रमाणों की कमी है . आत्माओं को "फंसाने" के लिए प्राचीन वृक्ष में कीलें ठोकने की प्रथा भी लोककथाओं पर आधारित एक प्रतीकात्मक कार्य है, जिसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है . आधुनिक विज्ञान में भूत और आत्माओं के अस्तित्व को अनुभवजन्य साक्ष्यों द्वारा समर्थित नहीं माना जाता है, इस प्रकार उनसे संबंधित मान्यताओं और प्रथाओं को अंधविश्वास की श्रेणी में रखा जाता है. हानिकारक अंधविश्वासी प्रथाओं जैसे डायन शिकार के खिलाफ राज्य की कानूनी स्थिति और "भूत मेला" के लिए सुरक्षा प्रदान करने के बीच विरोधाभास, गहरी जड़ें जमाए हुए सांस्कृतिक विश्वासों से निपटने के लिए एक जटिल और शायद व्यावहारिक दृष्टिकोण का सुझाव देता है, भले ही कुछ लोग उन्हें अंधविश्वासी मानते हों. यह स्थानीय आबादी के लिए घटना के सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व की मान्यता को दर्शा सकता है. आध्यात्मिक बीमारियों को "ठीक" करने पर ध्यान केंद्रित करने के बावजूद, मेले में चिकित्सा शिविरों और अंधविश्वास विरोधी जागरूकता पहलों की अनुपस्थिति इस विशिष्ट सांस्कृतिक घटना के साथ सार्वजनिक स्वास्थ्य या सामाजिक सुधार संगठनों की संभावित रूप से कम भागीदारी का अर्थ है. यह विभिन्न कारकों के कारण हो सकता है, जिसमें स्थानीय परंपराओं के प्रति सम्मान या संसाधनों और पहुंच की कमी शामिल है.
यहां कई राज्यों से घूमने आते हैं लोग
"भूत मेला" में बड़ी संख्या में लोग आते हैं, प्रत्येक नवरात्र मेले के दौरान हजारों लोग हैदरनगर में एकत्रित होते हैं . मेले का भौगोलिक दायरा भी व्यापक है, जिसमें पड़ोसी राज्यों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं . कुछ स्रोतों में "पूरे भारत" से लोगों के आने का उल्लेख है, जो संभावित रूप से और भी व्यापक पहुंच को दर्शाता है . मेले में भाग लेने वालों में महिलाओं की संख्या भी काफी अधिक है, कुछ स्रोतों में विशेष रूप से हजारों महिलाओं की भीड़ का उल्लेख है . झारखंड और कई पड़ोसी राज्यों से बड़ी संख्या में उपस्थित लोग आध्यात्मिक कष्टों से मुक्ति चाहने वालों के लिए "भूत मेला" के क्षेत्रीय महत्व और कथित प्रभावकारिता को उजागर करते हैं. राज्यों के एक विशिष्ट समूह (बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल) से उपस्थित लोगों का लगातार उल्लेख इन क्षेत्रों और हैदरनगर देवी धाम से जुड़ी परंपराओं के बीच संभावित सांस्कृतिक या ऐतिहासिक संबंधों का सुझाव देता है. इन राज्यों में समान मान्यताओं और प्रथाओं की व्यापकता पर आगे शोध अंतर्दृष्टिपूर्ण हो सकता है. उपस्थित लोगों में महिलाओं की उल्लेखनीय उपस्थिति यह संकेत दे सकती है कि महिलाएं इन समुदायों के भीतर आत्माओं के कब्जे से संबंधित मुद्दों से असमान रूप से प्रभावित या चिंतित हैं और इस मेले में सक्रिय रूप से उपचार की तलाश कर रही हैं. यह इन समुदायों के भीतर आध्यात्मिक उपचार की तलाश में लिंग आधारित भूमिकाओं को प्रतिबिंबित कर सकता है.

नवरात्र के समय लगता हैं भूत मेला
हैदरनगर और पलामू के स्थानीय समुदाय "भूत मेला" को किस प्रकार देखते और समझते हैं, यह जानना महत्वपूर्ण है. स्थानीय क्षेत्र में यह मेला "भूत मेला" के नाम से ही लोकप्रिय है, क्योंकि यहां भूत-प्रेत बाधा दूर कराने ("झाड़ फूंक") के लिए बड़ी संख्या में लोग आते हैं . स्थानीय लोगों का यह दृढ़ विश्वास है कि देवी मां का मंदिर और जिन बाबा की मजार की उपस्थिति नकारात्मक आध्यात्मिक प्रभावों से राहत दिलाने में विशेष रूप से प्रभावी है . मेले का ऐतिहासिक संबंध जमहर के एक हलवाई परिवार से बताया जाता है, जिसने कथित तौर पर 19वीं शताब्दी के अंत में इस परंपरा की शुरुआत की थी . यहां यह ध्यान देने योग्य है कि में हलवाई परिवार का उल्लेख है, जबकि और में जमींदार परिवार का, जो रिपोर्ट में उल्लेखित करने के लिए एक संभावित विसंगति प्रस्तुत करता है. स्थानीय लोगों का यह भी मानना है कि हैदरनगर में देवी की पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं, जिससे यह मेला क्षेत्रीय धार्मिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण हो जाता है . स्थानीय समुदाय द्वारा "भूत मेला" की स्वीकृति और यहां तक कि प्रचार, जैसा कि इसके लोकप्रिय नाम और देवी और जिन बाबा की संयुक्त शक्ति में विश्वास से स्पष्ट है, स्थानीय सांस्कृतिक और धार्मिक ताने-बाने में इसके गहरे एकीकरण को इंगित करता है. जमहर के एक परिवार को मेले की ऐतिहासिक उत्पत्ति, यह सुझाव देती है कि परंपरा समय के साथ विकसित हुई है और स्थानीय पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है. हलवाई और जमींदार परिवारों के बीच विसंगति को स्वीकार किया जाना चाहिए और यदि अधिक जानकारी उपलब्ध हो तो संभावित रूप से आगे पता लगाया जाना चाहिए. देवी सभी इच्छाओं को पूरा करती हैं, इस स्थानीय दृष्टिकोण के साथ-साथ आत्माओं के कष्टों से राहत पर विशेष ध्यान, समुदाय के भीतर हैदरनगर देवी धाम की कथित भूमिका को सामान्य कल्याण और विशिष्ट आध्यात्मिक उपचार दोनों के एक शक्तिशाली स्रोत के रूप में उजागर करता है.
परंपराओं और सांस्कृतिक प्रथाओं के व्यापक संदर्भ में सांस्कृतिक महत्व रखता है यह मेला
"भूत मेला" झारखंड की स्थानीय परंपराओं और सांस्कृतिक प्रथाओं के व्यापक संदर्भ में सांस्कृतिक महत्व रखता है. इस मेले का लंबा इतिहास है, जो कम से कम 1887 से चला आ रहा है, जो इस क्षेत्र में एक लंबे समय से चली आ रही परंपरा के रूप में इसकी स्थापना को दर्शाता है . "भूत मेला" मुख्यधारा की हिंदू धार्मिक प्रथाओं (नवरात्रि, देवी की पूजा) के साथ आत्माओं, उपचार और पारंपरिक चिकित्सकों ("ओझा गुनियों") की भूमिका से संबंधित स्थानीय लोक मान्यताओं के एक अद्वितीय संगम का प्रतिनिधित्व करता है . यह मेला विभिन्न समुदायों और पड़ोसी राज्यों के लोगों के लिए एक सामाजिक और सांस्कृतिक मिलन स्थल के रूप में कार्य करता है, जो विश्वासों और प्रथाओं के आदान-प्रदान और अंतःक्रिया को बढ़ावा देता है . इन पारंपरिक मान्यताओं और आधुनिक, वैज्ञानिक दृष्टिकोणों के साथ-साथ अंधविश्वास से लड़ने के राज्य के प्रयासों के बीच संभावित तनाव को भी स्वीकार करना महत्वपूर्ण है, फिर भी मेले के लिए सुरक्षा प्रदान करना भी जारी है . "भूत मेला" पलामू क्षेत्र की एक गहरी जड़ें वाली सांस्कृतिक परंपरा है, जिसका इतिहास एक सदी से भी अधिक पुराना है. यह दीर्घायु स्थानीय सांस्कृतिक परिदृश्य के भीतर इसके महत्व को रेखांकित करती है. मेला औपचारिक धार्मिक प्रथाओं (नवरात्रि के दौरान हिंदू धर्म) और आत्माओं और पारंपरिक उपचार विधियों में विश्वास पर केंद्रित स्थानीय लोक परंपराओं के बीच जटिल अंतःक्रिया का उदाहरण देता है. विभिन्न आध्यात्मिक ढाँचों का यह मिश्रण घटना के सांस्कृतिक महत्व की एक परिभाषित विशेषता है. "भूत मेला" एक महत्वपूर्ण सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थान के रूप में कार्य करता है, जो विभिन्न पृष्ठभूमि और क्षेत्रों के लोगों को एक साथ लाता है जो समान विश्वास साझा करते हैं और आध्यात्मिक राहत के समान रूपों की तलाश करते हैं. यह सामूहिक अनुभव संभवतः इन विश्वासों को मजबूत करता है और सामुदायिक बंधनों को मजबूत करता है. राज्य का अस्पष्ट रवैया (अंधविश्वास के खिलाफ कानून बनाम सुरक्षा प्रदान करना) इस संदर्भ में परंपरा, आधुनिकता और शासन के बीच जटिल संबंध को और उजागर करता है.
निष्कर्षतः, हैदरनगर का "भूत मेला" आस्था और अंधविश्वास दोनों तत्वों का एक जटिल मिश्रण प्रस्तुत करता है. भक्तों की हैदरनगर देवी में गहरी आस्था और मेले में किए गए अनुष्ठानों की प्रभावकारिता में उनका सच्चा विश्वास निर्विवाद है. साथ ही, आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कुछ प्रथाएं और मान्यताएं अंधविश्वास की श्रेणी में आती हैं. "भूत मेला" एक अद्वितीय सांस्कृतिक घटना के रूप में महत्वपूर्ण है जो इस क्षेत्र में धार्मिक भक्ति, स्थानीय परंपराओं और स्थायी लोक मान्यताओं के अंतःक्रिया को दर्शाती है. अंततः, "भूत मेला" को शायद आस्था और अंधविश्वास के बीच एक द्विआधारी विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि एक जटिल सामाजिक-सांस्कृतिक घटना के रूप में समझा जाता है, जहां ये दोनों पहलू प्रतिभागियों और समुदाय के लिए आपस में जुड़े हुए और परस्पर सुदृढ़ होते हैं.