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रांची/डेस्क: चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर आज पांचवें दिन मां दुर्गा के पंचम स्वरूप मां स्कंदमाता की पूजा की जा रही हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन विधि-विधान से पूजा करने पर संतान प्राप्ति के योग बनते है और संतान से जुड़े सभी कष्ट दूर होते हैं. इस साल नवरात्रि की शुरुआत 19 मार्च से हुई है और भक्त पूरे श्रद्धा भाव से माता की आराधना में जुटे हैं.
मां स्कंदमाता को भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता माना जाता हैं. यही कारण है कि उन्हें मातृत्व, करुणा और पालन-पोषण का प्रतीक कहा जाता हैं. मान्यता है कि मां की कृपा से संतान सुख के साथ-साथ परिवार में खुशहाली और शांति बनी रहती हैं.
ऐसा है मां स्कंदमाता का दिव्य स्वरूप
मां स्कंदमाता का स्वरूप अत्यंत शांत और सौम्य माना जाता हैं. उनकी चार भुजाएं होती है-दो हाथों में कमल पुष्प, एक हाथ में बाल रूप में भगवान कार्तिकेय और चौथा हाथ आशीर्वाद देने की मुद्रा में होता हैं. मां का वाहन सिंह है, लेकिन वे कमल के आसन पर विराजमान रहती है इसलिए उन्हें ‘पद्मासना देवी’ भी कहा जाता हैं.
पूजा विधि: ऐसे करें मां को प्रसन्न
सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और घर के पूजा स्थल पर मां स्कंदमाता की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें. इसके बाद उन्हें फूल, अक्षत, रोली और पंचामृत अर्पित करें. केले का भोग लगाकर मंत्रों का जाप करें और अंत में आरती करें. सच्चे मन और श्रद्धा से की गई पूजा से मां शीघ्र प्रसन्न होती हैं.
भोग में क्या चढ़ाएं?
मां स्कंदमाता को पीले रंग की मिठाइयां अत्यंत प्रिय मानी जाती हैं. इस दिन भक्त बेसन के लड्डू, केसर की खीर या अन्य पीली मिठाई का भोग लगा सकते हैं. मान्यता है कि इससे माता का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता हैं.
कमल फूल का विशेष महत्व
मां स्कंदमाता को कमल का फूल बहुत प्रिय है इसलिए इस दिन उनके चरणों में कमल अर्पित करना शुभ माना जाता हैं. ऐसा करने से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.
इन मंत्रों से करें मां का ध्यान
मां स्कंदमाता की पूजा में विशेष मंत्रों का जाप करने का महत्व बताया गया हैं.
वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा स्कन्दमाता यशस्वनीम्।।
धवलवर्णा विशुध्द चक्रस्थितों पंचम दुर्गा त्रिनेत्रम्।
अभय पद्म युग्म करां दक्षिण उरू पुत्रधराम् भजेम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानांलकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल धारिणीम्॥
प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वांधरा कांत कपोला पीन पयोधराम्।
कमनीया लावण्या चारू त्रिवली नितम्बनीम्॥
स्कंदमाता का स्तोत्र पाठ
नमामि स्कन्दमाता स्कन्दधारिणीम्।
समग्रतत्वसागररमपारपार गहराम्॥
शिवाप्रभा समुज्वलां स्फुच्छशागशेखराम्।
ललाटरत्नभास्करां जगत्प्रीन्तिभास्कराम्॥
महेन्द्रकश्यपार्चिता सनंतकुमाररसस्तुताम्।
सुरासुरेन्द्रवन्दिता यथार्थनिर्मलादभुताम्॥
अतर्क्यरोचिरूविजां विकार दोषवर्जिताम्।
मुमुक्षुभिर्विचिन्तता विशेषतत्वमुचिताम्॥
नानालंकार भूषितां मृगेन्द्रवाहनाग्रजाम्।
सुशुध्दतत्वतोषणां त्रिवेन्दमारभुषताम्॥
सुधार्मिकौपकारिणी सुरेन्द्रकौरिघातिनीम्।
शुभां पुष्पमालिनी सुकर्णकल्पशाखिनीम्॥
तमोन्धकारयामिनी शिवस्वभाव कामिनीम्।
सहस्त्र्सूर्यराजिका धनज्ज्योगकारिकाम्॥
सुशुध्द काल कन्दला सुभडवृन्दमजुल्लाम्।
प्रजायिनी प्रजावति नमामि मातरं सतीम्॥
स्वकर्मकारिणी गति हरिप्रयाच पार्वतीम्।
अनन्तशक्ति कान्तिदां यशोअर्थभुक्तिमुक्तिदाम्॥
पुनःपुनर्जगद्वितां नमाम्यहं सुरार्चिताम्।
जयेश्वरि त्रिलोचने प्रसीद देवीपाहिमाम्॥
मां स्कंदमाता की आरती
जय तेरी हो स्कंदमाता
पांचवां नाम तुम्हारा आता
सब के मन की जानन हारी
जग जननी सब की महतारी
तेरी ज्योत जलाता रहूं मैं
हरदम तुम्हें ध्याता रहूं मैं
कई नामो से तुझे पुकारा
मुझे एक है तेरा सहारा
कही पहाड़ों पर है डेरा
कई शहरों में तेरा बसेरा
हर मंदिर में तेरे नजारे
गुण गाये तेरे भगत प्यारे
भगति अपनी मुझे दिला दो
शक्ति मेरी बिगड़ी बना दो
इन्दर आदी देवता मिल सारे
करे पुकार तुम्हारे द्वारे
दुष्ट दत्य जब चढ़ कर आये
तुम ही खंडा हाथ उठाये
दासो को सदा बचाने आई
‘चमन’ की आस पुजाने आई
मां स्कंदमाता के मंत्र
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया.
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥
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