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रांची/डेस्क: झारखंड हाईकोर्ट ने जमीन बेचने और फ्लैट देने के नाम पर लाखों रुपये की धोखाधड़ी करने के मामले में आरोपी नवीन अंशु को राहत देने से साफ इनकार कर दिया है. न्यायाधीश प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की कोर्ट ने मामले की गंभीरता और उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए आरोपी नवीन अंशु की क्रिमिनल रिवीजन याचिका को खारिज कर दिया है. इसके साथ ही रांची की निचली अदालत द्वारा उनके खिलाफ केस चलाने के आदेश को सही ठहराया है.
क्या है पूरा विवाद और आरोप?
यह मामला धनबाद निवासी तरुण गुप्ता द्वारा रांची के बरियातु थाने में दर्ज कराई गई प्राथमिकी से जुड़ा है. आरोप के अनुसार, साल 1991-92 में तरुण गुप्ता की फर्म (M/s Coal Inspection Service) और आरोपी नवीन अंशु व उनके पिता पी.डी.एन. सिन्हा के बीच एक जमीन की खरीद-बिक्री को लेकर समझौता हुआ था. इसके एवज में किस्तों में कुल 4 लाख रुपये का एडवांस भुगतान किया गया था.
दिसंबर 1998 में दोनों पक्षों के बीच एक नया समझौता हुआ, जिसके तहत आरोपियों को या तो तरुण गुप्ता को 7.50 लाख रुपये लौटाने थे या फिर उस जमीन पर बनने वाले जॉइंट वेंचर प्रोजेक्ट में दो फ्लैटों का मालिकाना हक देना था. शिकायतकर्ता का आरोप है कि आरोपियों ने उनकी सहमति के बिना उस जमीन पर एक बहुमंजिला इमारत (Multistoried Building) खड़ी कर दी और उसे अन्य लोगों व बिल्डरों की मदद से बेचकर करीब 5 करोड़ रुपये कमा लिए. लेकिन तरुण गुप्ता की फर्म को न तो जमीन मिली, न फ्लैट और न ही उनके पैसे लौटाए गए.
मामले का कानूनी सफर
इस मामले में बरियातु पुलिस ने पहले जांच के बाद इसे 'दीवानी विवाद' (Civil Dispute) बताते हुए फाइनल फॉर्म दाखिल कर दिया था. इसके खिलाफ शिकायतकर्ता तरुण गुप्ता ने कोर्ट में प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल की. निचली अदालत ने गवाहों के बयान और प्राथमिक जांच के बाद आरोप को सही पाते हुए नवीन अंशु के खिलाफ समन जारी किया था.
इसके बाद आरोपी नवीन अंशु ने कोर्ट से खुद को दोषमुक्त (Discharge) करने की गुहार लगाई थी, जिसे 11 सितंबर 2017 को मजिस्ट्रेट कोर्ट ने खारिज कर दिया था. इसी आदेश को आरोपी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी.
हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका?
सुनवाई के दौरान आरोपी के अधिवक्ता ने दलील दी कि यह पूरा मामला पूरी तरह से दीवानी (Civil) प्रकृति का है और धनबाद की अदालतों में इससे जुड़े सिविल केस पहले ही खारिज हो चुके हैं, इसलिए आपराधिक मामला नहीं बनता.
हालांकि, हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया और अपने आदेश में कहा कि कोर्ट ने पाया कि मामले में आरोपी पक्ष द्वारा शिकायतकर्ता से 4 लाख रुपये लेने की बात स्वीकार की गई है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निचली अदालत ने गवाहों के बयानों और शुरुआती सबूतों के आधार पर प्रथम दृष्टया मामला सही पाया है. आरोपी द्वारा दी जा रही दलीलें ऐसे तथ्य हैं जिनका फैसला केवल ट्रायल (मुकदमे की सुनवाई) के दौरान गवाहियों के आधार पर ही किया जा सकता है.
हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले में किसी भी प्रकार की कानूनी त्रुटि न पाते हुए आरोपी की याचिका को खारिज कर दिया और पूर्व में दिए गए किसी भी रोक के आदेश (Stay Order) को भी तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया है.
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