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रांची/डेस्क: झारखंड हाईकोर्ट ने चेक बाउंस से जुड़े एक मामले में बड़ा और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि सिर्फ जेल की सजा काट लेने से कोई भी दोषी मुआवजे (Compensation) की रकम चुकाने की अपनी देनदारी से मुक्त नहीं हो जाता है. न्यायाधीश प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने हजारीबाग के चौपारण व्यवसायी विकास कुमार की क्रिमिनल रिवीजन याचिका को खारिज करते हुए निचली अदालत द्वारा दी गई सजा और मुआवजे के आदेश को पूरी तरह बरकरार रखा है.
क्या था पूरा मामला और आपसी विवाद?
मामला हजारीबाग जिले के चौपारण का है, जहां शिकायतकर्ता दिनेश प्रसाद केसरी और आरोपी विकास कुमार ने संयुक्त रूप से व्यापार करने के लिए एक 'टाटा हिटाची एक्सकेवेटर' मशीन खरीदी थी. इस संयुक्त व्यवसाय में दिनेश प्रसाद की 75% और विकास कुमार की 25% हिस्सेदारी थी.
बाद में वित्तीय संकट के चलते दिनेश ने व्यापार से अलग होने की इच्छा जताई. आपसी सहमति से मशीन की कुल कीमत 12 लाख रुपये तय हुई, जिसके तहत विकास कुमार को दिनेश के हिस्से के रूप में 6.75 लाख रुपये का भुगतान करना था. इसी देनदारी को आंशिक रूप से चुकाने के लिए विकास कुमार ने 4 अप्रैल 2015 को 3.25 लाख रुपये का एक चेक (नंबर 140811) दिनेश के नाम जारी किया.
चेक बाउंस और कानूनी कार्रवाई
जब दिनेश प्रसाद केसरी ने इस चेक को भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की चौपारण शाखा में अपने खाते में जमा किया, तो वह "खाते में अपर्याप्त राशि" (Insufficient Funds) के कारण बाउंस हो गया. दिनेश द्वारा 11 अप्रैल 2015 को कानूनी नोटिस भेजे जाने के बाद भी जब विकास ने पैसे नहीं लौटाए, तो दिनेश ने कोर्ट में शिकायत वाद दर्ज कराया.
निचली अदालतों का फैसला
हजारीबाग की मजिस्ट्रेट अदालत ने 18 दिसंबर 2017 को विकास कुमार को नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत दोषी ठहराया था. अदालत ने उसे 3 महीने की सश्रम कारावास की सजा सुनाई साथ ही पीड़ित दिनेश को 3.75 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था.
इसके बाद 9 जनवरी 2020 को हजारीबाग के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-VIII ने भी विकास की अपील को खारिज करते हुए इस सजा को सही ठहराया था, जिसे विकास कुमार ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी.
हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका?
सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि आरोपी विकास कुमार अपनी 3 महीने की जेल की सजा पूरी काट चुका है, लेकिन उसने अब तक 3.75 लाख रुपये के मुआवजे का भुगतान नहीं किया है. विकास के वकील ने दलील दी कि चेक केवल सुरक्षा (Security) के तौर पर दिया गया था और शिकायत समय से पहले दर्ज की गई थी.
हाईकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट के 'कुमारन बनाम केरल राज्य (2017)' के फैसले का हवाला दिया. अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि केवल जेल की सजा भुगत लेने से दोषी अपनी वित्तीय देनदारी से बच नहीं सकता. अदालत मुआवजे की रकम वसूलने के लिए दोषी के खिलाफ डिस्ट्रेस वारंट (Distress Warrant) जारी कर सकती है. कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता ने चेक, बैंक का रिटर्न मेमो और पोस्टल रसीद जैसे सभी पुख्ता दस्तावेजी सबूत पेश किए हैं, जिससे आरोपी की गलती साफ सिद्ध होती है.
हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के फैसले को सही मानते हुए क्रिमिनल रिवीजन याचिका को खारिज कर दिया और संबंधित कोर्ट को आगे की आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया.
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