आशिष शास्त्री/न्यूज11 भारत
सिमडेगा/डेस्क: प्रकृति, कृषि, भाई-बहन के स्नेह और सदियों पुरानी लोक परंपराओं से जुड़ा करमा पर्व जिले में उल्लास और आस्था के साथ मनाया जाएगा. भादो मास की एकादशी को मनाए जाने वाले इस पर्व को लेकर गांव-मोहल्लों में तैयारियां पूरी कर ली गई हैं. करमा पर्व की खासियत यह है कि इसकी तैयारी पूजा के दिन से नहीं, बल्कि करीब सात दिन पहले से शुरू हो जाती है. जावा उठाने से लेकर करम डाली की स्थापना और सामूहिक नृत्य तक, पर्व की हर परंपरा में प्रकृति और कृषि जीवन की झलक दिखाई देती है.
करमा पर्व में कुंवारी युवतियों की विशेष भूमिका होती है. पर्व की तैयारी के दौरान युवतियां नियम-संयम का पालन करते हुए जावा की सेवा करती हैं. सात दिन पहले टोकरी में विभिन्न अनाजों के बीज बोकर जावा उगाया जाता है. इन अंकुरों को कृषि, हरियाली, नई उम्मीद और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है. पर्व के दिन युवतियां दिनभर उपवास रखकर अपने भाइयों की सुख-समृद्धि, लंबी उम्र और परिवार की खुशहाली की कामना करेंगी.
शाम के समय गांव के अखड़ा या घर के आंगन में पूजा स्थल तैयार किया जाएगा. यहां करम वृक्ष की डाली को विधि-विधान के साथ स्थापित कर पूजा-अर्चना की जाएगी. करम डाली के पास जावा रखकर प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त किया जाएगा. इसके बाद करमा गीतों और पारंपरिक नृत्य का दौर शुरू होगा. कई स्थानों पर युवतियां जावा को बालों में सजाकर सामूहिक नृत्य करती हैं. मांदर और ढोल की थाप के साथ युवक-युवतियों के पारंपरिक नृत्य से गांवों का वातावरण देर रात तक उत्सवी बना रहेगा.
विवाह के बाद बदल जाती है बहन की भूमिका
करमा पूजा की परंपराओं में भाई-बहन के रिश्ते को विशेष महत्व दिया जाता है. जिले के कई समुदायों और क्षेत्रों में मान्यता है कि विवाह के बाद जब युवती ससुराल चली जाती है तो मायके में करमा पूजा में उसकी भूमिका समाप्त मानी जाती है. स्थानीय परंपरा के अनुसार शादी के पहले वर्ष में वह अपने भाई को करमा की पूजन सामग्री और उससे जुड़े दायित्व सौंपकर इस परंपरा को आगे बढ़ाती है. हालांकि अलग-अलग समुदायों और क्षेत्रों में इसकी परंपराओं में कुछ भिन्नताएं भी देखने को मिलती हैं.
करमा पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है. यह ग्रामीण समाज के सामूहिक जीवन, लोकगीत, संगीत और नृत्य को भी जीवंत करता है. पूजा के बाद अखड़ों में करमा गीत गूंजते हैं और मांदर-ढोल की थाप पर पारंपरिक नृत्य होता है. कई स्थानों पर आधुनिक संगीत भी उत्सव का हिस्सा बन गया है. इस दौरान पूरा गांव सामूहिक उल्लास में शामिल होता है.
पर्व के समापन पर करम डाली और जावा को विधि-विधान के साथ नदी, तालाब अथवा अन्य जलाशयों में विसर्जित किया जाता है. इस तरह करमा पर्व प्रकृति के प्रति सम्मान, कृषि संस्कृति, पारिवारिक संबंधों और सामुदायिक एकजुटता की परंपरा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाता है.
यह भी पढ़ें: पत्नी का मायके जाना और पति को घरजमाई बनाने की इच्छा ‘क्रूरता’ नहीं : झारखंड हाईकोर्ट