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रांची/डेस्क: रांची की रहने वाली पूनम कुजूर झारखंडी तरबूज की खेती करके लाखों रुपये की कमाई कर रही हैं. नामकुम प्रखंड के विकास बस्ती में पूनम कुजूर पिछले 5 सालों से अपने भाई कोमल कच्छप के साथ मिलकर देसी तरबूज की खेती कर रही हैं. उनका यह प्रयास ना सिर्फ एक सफल कृषि मॉडल बन चुका है, बल्कि महिला सशक्तिकरण का भी एक बेहतरीन उदाहरण बन गया है.
पूनम कुजूर आदिवासी समाज से आती हैं और उनका परिवार पूरी तरह से खेती पर निर्भर है. उन्होंने अपने भाई के साथ मिलकर खेती को ही रोजगार का जरिया बनाया है. तरबूज की खेती ने उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाया है. कोमल कच्छप बताती हैं कि एक सीजन में तरबूज की खेती से करीब 5 लाख रुपये का मुनाफा हो जाता है.
छोटे पैमाने पर की इसकी शुरुआत
कोमल कच्छप ने बताया कि कुछ साल पहले उन्हें तरबूज की खेती करने का विचार आया. उन्होंने स्थानीय मिट्टी और जलवायु की जांच की और पाया कि यहां की जमीन तरबूज की खेती के लिए बेहद उपयुक्त है. इसके बाद उन्होंने छोटे पैमाने पर इसकी शुरुआत की और धीरे-धीरे इसे बढ़ाया. अब पूनम और कोमल मिलकर बड़े पैमाने पर देसी तरबूज की खेती करते हैं. खास बात यह है कि ये तरबूज पूरी तरह देसी किस्म के होते हैं, जिनकी बाजार में अच्छी मांग रहती है. कोमल कहते हैं कि अगर किसान मेहनत और तकनीक के साथ खेती करें, तो खेती भी मुनाफे का जरिया बन सकती है.
कोमल कच्छप ने बताया कि झारखंड में काफी उपजाऊ मिट्टी है, लेकिन जानकारी के अभाव में किसान आधुनिक खेती की ओर नहीं बढ़ पा रहे हैं. कोमल और पूनम चाहते हैं कि उनके इस काम को देखकर दूसरे किसान भी प्रेरित हों और खेती के आधुनिक तरीकों को अपनाएं. पूनम कुजूर की मेहनत और लगन ने यह साबित कर दिया है कि महिलाएं अगर ठान लें, तो किसी भी क्षेत्र में सफलता हासिल कर सकती हैं. उनका यह सफर अब कई किसानों और महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुका है.