मुमताज अहमद/न्यूज11 भारत
खलारी/डेस्क: खलारी पंचायत के मैरिज हॉल एवं ईद मिलाद-उन-नबी कार्यक्रम के लिए चिह्नित बताई जा रही भूमि पर कथित कब्जे और दावेदारी के बीच भवन का निर्माण पूरा हो जाना अब अंचल प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है. खास बात यह है कि भूमि को लेकर विवाद और निर्माण से संबंधित खबरें सार्वजनिक होने के बावजूद निर्माण कार्य नहीं रुका. भवन पूरा होने के बाद अंचल प्रशासन की ओर से संबंधित पक्ष को नोटिस जारी किया गया है.
मामला खलारी अंचल कार्यालय के समीप स्थित उस भूमि का है, जिस पर शिवानी देवी, पति उर्फ संटू यादव, द्वारा भवन निर्माण कराए जाने की बात सामने आई है. शिवानी देवी उक्त भूमि को अपना बताते हुए निर्माण को वैध बता रही हैं. हालांकि भूमि के स्वामित्व, प्रकृति और उपयोग को लेकर स्थिति अभी प्रशासनिक जांच के अधीन है.
जब विवाद की जानकारी थी तो निर्माण कैसे पूरा हुआ?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि अंचल प्रशासन को भूमि विवाद और निर्माण की जानकारी थी, तो निर्माणाधीन भवन पर समय रहते रोक लगाने अथवा स्थल की जांच कराने की कार्रवाई क्यों नहीं हुई? समाचार प्रकाशित होने के बाद भी यदि निर्माण जारी रहा तो प्रशासन की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
स्थानीय लोगों के बीच यह सवाल भी चर्चा में है कि आखिर निर्माण की नींव से लेकर भवन के पूरा होने तक प्रशासनिक स्तर पर क्या कार्रवाई की गई? यदि कार्रवाई नहीं की गई तो इसकी वजह क्या रही और अब भवन पूरा होने के बाद नोटिस भेजने की जरूरत क्यों पड़ी?
‘माननीय महोदय’ के कथित प्रभाव की चर्चा, प्रतिनिधियों की भूमिका पर भी सवाल
सूत्रों द्वारा उक्त मामले को लेकर स्थानीय स्तर पर माननीय महोदय के कथित प्रभाव और उनके द्वारा बनाए गए प्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर भी तरह-तरह की चर्चाएं सामने आ रही हैं. आरोप और चर्चाएं यह भी हैं कि राजनीतिक लाभ के लिए सरकारी अथवा सार्वजनिक उपयोग की बताई जा रही भूमि पर कथित अतिक्रमण को प्रत्यक्ष या परोक्ष सहयोग मिला.
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित माननीय महोदय अथवा उनके प्रतिनिधियों का पक्ष सामने आना बाकी है. लेकिन सवाल यह है कि यदि भूमि वास्तव में सरकारी या सार्वजनिक उपयोग के लिए चिह्नित है, तो उस पर निर्माण की स्थिति पैदा कैसे हुई और जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों अथवा उनके प्रतिनिधियों ने समय रहते प्रशासन का ध्यान इस ओर क्यों नहीं दिलाया?
क्या राजनीतिक प्रभाव के कारण प्रशासन ने आंखें मूंदे रखीं, या फिर यह महज प्रशासनिक चूक थी? इसका जवाब अब जांच और कार्रवाई से ही सामने आएगा.
कानून आम लोगों के लिए और प्रभावशाली लोगों के लिए अलग क्यों?
इस पूरे घटनाक्रम ने एक और गंभीर सवाल खड़ा किया है. आम व्यक्ति द्वारा सरकारी या विवादित भूमि पर निर्माण किए जाने की स्थिति में प्रशासन तत्काल कार्रवाई करता है, तो फिर यहां निर्माण पूरा होने तक प्रशासनिक हस्तक्षेप क्यों नहीं हुआ?
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि किसी प्रभावशाली व्यक्ति के राजनीतिक संपर्क या कथित संरक्षण के कारण प्रशासनिक कार्रवाई में देरी हुई है, तो यह प्रशासन की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न होगा. वहीं यदि ऐसा कोई प्रभाव नहीं था, तो प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि विवादित भूमि पर निर्माण की निगरानी और समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की गई.
सरकारी या सार्वजनिक भूमि है तो निजी निर्माण कैसे?
यदि भूमि सरकारी अथवा सार्वजनिक उपयोग के लिए चिह्नित है तो निजी भवन का निर्माण कैसे हुआ? और यदि भूमि निजी है तो संबंधित पक्ष के पास उसके स्वामित्व के कौन-कौन से वैध दस्तावेज हैं? इन सवालों का जवाब राजस्व अभिलेख, भूमि की प्रकृति, स्वामित्व संबंधी दस्तावेज और स्थल जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा.
सीओ बोले- नोटिस भेजा, दस्तावेजों की जांच के बाद होगी कार्रवाई
खलारी अंचल अधिकारी प्रणव कुमार अम्बष्ट ने बताया कि शिवानी देवी को उक्त भूमि पर किए गए निर्माण के संबंध में नोटिस भेजा गया है. उन्हें भूमि से संबंधित कागजात प्रस्तुत करने तथा निर्माण को लेकर स्पष्टीकरण देने के लिए अंचल कार्यालय बुलाया गया है. उन्होंने बताया कि संबंधित दस्तावेजों की जांच के बाद नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी.
अब जांच से तय होगा- दावा सही या अतिक्रमण का खेल
फिलहाल पूरा मामला प्रशासनिक जांच के पाले में है. जांच में यदि भूमि सरकारी अथवा सार्वजनिक उपयोग की पाई जाती है और निर्माण नियमों के विपरीत पाया जाता है, तो प्रशासन की अगली कार्रवाई बेहद महत्वपूर्ण होगी. वहीं यदि भूमि निजी और निर्माण वैध पाया जाता है तो संबंधित दस्तावेजों के आधार पर स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए.
क्योंकि मामला सिर्फ एक भवन का नहीं है. यह सवाल सरकारी एवं सार्वजनिक भूमि की सुरक्षा, राजनीतिक प्रभाव से मुक्त प्रशासनिक कार्रवाई और कानून के समान अनुपालन का है.
अब निगाह इस बात पर है कि अंचल प्रशासन केवल नोटिस तक सीमित रहता है या जांच पूरी कर कोई ठोस और निष्पक्ष कार्रवाई भी करता है. साथ ही स्थानीय लोगों की नजर इस बात पर भी है कि माननीय महोदय और उनके प्रतिनिधियों पर लगाए जा रहे कथित राजनीतिक संरक्षण एवं सहयोग के आरोपों का सच क्या है. यदि आरोप निराधार हैं तो संबंधित पक्ष को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए और यदि किसी प्रकार का प्रभाव या हस्तक्षेप हुआ है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए.
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