मुमताज अहमद/न्यूज11 भारत
खलारी/डेस्क: सरकार सरकारी विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ स्वच्छ पेयजल, शौचालय और अन्य आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है. इसके बावजूद खलारी प्रखंड की लपरा पंचायत स्थित राजकीयकृत उत्क्रमित मध्य विद्यालय, बहेरा टांड़ में हालात सरकारी दावों की हकीकत बयां कर रहे हैं. विद्यालय परिसर में दो चापानल लगे होने के बावजूद दोनों से पानी नहीं निकल रहा. नतीजतन बच्चों के पीने के पानी और मध्याह्न भोजन तैयार करने के लिए रसोइयों को प्रतिदिन करीब 500 मीटर दूर से पानी लाना पड़ रहा है.
विद्यालय की प्रतिनियुक्त प्रधानाध्यापिका गीता देवी ने बताया कि लगभग आठ माह पूर्व प्रभार संभालने के बाद विद्यालय की कई मूलभूत कमियां सामने आईं. उन्होंने कहा कि बच्चों की पढ़ाई के साथ-साथ विद्यालय की आधारभूत सुविधाओं को दुरुस्त करने का लगातार प्रयास किया जा रहा है.
उन्होंने बताया कि विद्यालय में शौचालय निर्माण का कार्य वर्षों पहले शुरू हुआ था, लेकिन संवेदक इसे अधूरा छोड़कर चला गया. पंचायत की मुखिया की पहल पर कुछ कार्य अवश्य हुआ, लेकिन आज भी शौचालय पूरी तरह तैयार नहीं हो सका है. इससे छात्र-छात्राओं और शिक्षकों को रोजाना कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है.
प्रधानाध्यापिका के अनुसार, जिला स्तर से शौचालय और पेयजल व्यवस्था के लिए राशि भी उपलब्ध कराई गई थी. संवेदक ने चापानल की बोरिंग तो कराई, लेकिन उसे चालू नहीं कराया. बाद में असामाजिक तत्वों द्वारा बोरिंग में पत्थर डाल दिए जाने से चापानल पूरी तरह बेकार हो गया. ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि निर्माण कार्य समय पर पूरा होता और उसकी समुचित निगरानी एवं रखरखाव होता, तो क्या आज बच्चों को इस समस्या का सामना करना पड़ता?
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि क्षेत्र के कई विद्यालयों में एक ही निर्माण एजेंसी द्वारा शौचालय एवं अन्य निर्माण कार्य कराए गए हैं और अधिकांश स्थानों पर निर्माण की गुणवत्ता को लेकर शिकायतें सामने आई हैं. इससे कार्यों की गुणवत्ता, विभागीय निगरानी और निर्माण एजेंसियों की जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं.
विद्यालय प्रबंधन और ग्रामीणों ने शिक्षा विभाग से पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कर दोषी संवेदकों एवं जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई करने तथा विद्यालय में अविलंब पेयजल और शौचालय की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की है.
बड़ा सवाल
- क्या सरकारी योजनाओं का पैसा केवल कागजों तक सिमटकर रह गया है?
- जब करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद मासूम बच्चों को पीने का पानी 500 मीटर दूर से ढोकर लाना पड़े, शौचालय वर्षों तक अधूरा पड़ा रहे और विद्यालय की मूलभूत सुविधाएं बहाल न हो सकें, तो यह केवल एक विद्यालय की समस्या नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न है.
यदि निर्माण कार्य अधूरा है, चापानल आज तक चालू नहीं हुए और सरकारी राशि खर्च हो चुकी है, तो इसकी जवाबदेही केवल संवेदक तक सीमित नहीं रह सकती. कार्य की स्वीकृति, तकनीकी जांच, गुणवत्ता नियंत्रण, भुगतान प्रक्रिया और निगरानी से जुड़े शिक्षा विभाग, संबंधित निर्माण एजेंसी, विभागीय अभियंताओं तथा प्रखंड एवं जिला स्तर के जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए.
बच्चों का भविष्य किसी संवेदक की लापरवाही, विभागीय उदासीनता या कमजोर निगरानी की भेंट नहीं चढ़ सकता. अब जरूरत केवल आश्वासनों की नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने, दोषियों पर सख्त कार्रवाई करने और यह सुनिश्चित करने की है कि सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तव में विद्यालयों और बच्चों तक पहुंचे.
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