मुमताज अहमद/न्यूज11 भारत
खलारी/डेस्क: डकरा परियोजना में माइनिंग कार्य के दौरान निकलने वाली गैस की तेज दुर्गंध के साथ उड़ने वाले धूलकणों ने आसपास के ग्रामीणों और राहगीरों की परेशानी बढ़ा दी है. लोगों का कहना है कि एक ओर माइनिंग के दौरान तेज गंध वाला गैस का गुब्बारा निकलता है, वहीं दूसरी ओर खदान क्षेत्र से उठने वाला डस्ट आसपास के वातावरण में फैलता है. ऐसे में लोगों को साफ हवा के बजाय गैस और धूलकणों के बीच सांस लेने को मजबूर होना पड़ रहा है.
ग्रामीणों के अनुसार माइनिंग के बाद कई बार वातावरण में तेज दुर्गंध और धूल की परत महसूस होती है. सड़क से गुजरने वाले राहगीर नाक-मुंह ढककर निकलते हैं. आसपास रहने वाले परिवारों का कहना है कि धूल और दुर्गंध के कारण सांस लेने में परेशानी, गले में खराश, आंखों में जलन, सिरदर्द और बेचैनी जैसी शिकायतें सामने आती हैं.
सवाल सिर्फ दुर्गंध का नहीं, हवा की गुणवत्ता का है
खदान से निकलने वाली धूल में यदि सूक्ष्म कण अधिक मात्रा में मौजूद हों और उनका लगातार संपर्क बना रहे, तो यह श्वसन तंत्र के लिए नुकसानदायक हो सकता है. लंबे समय तक धूलकणों के संपर्क से खांसी, सांस फूलना और अन्य श्वसन संबंधी समस्याएं बढ़ सकती हैं. वहीं गैस की प्रकृति जाने बिना उसके स्वास्थ्य प्रभाव को लेकर निश्चित निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं होगा.
इसीलिए ग्रामीणों का सवाल है कि डकरा परियोजना क्षेत्र की हवा की नियमित जांच हो रही है या नहीं? गैस और धूलकणों की मात्रा कितनी है? क्या यह निर्धारित सुरक्षा मानकों के भीतर है?
बीमारी का इंतजार या पहले से सावधानी?
ग्रामीणों का कहना है कि माइनिंग क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों के साथ आसपास रहने वाली आबादी और रोजाना सड़क से गुजरने वाले राहगीरों की सेहत भी महत्वपूर्ण है. यदि गैस और डस्ट का असर आबादी तक पहुंच रहा है तो परियोजना प्रबंधन को इसे सामान्य प्रदूषण मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
लोगों ने गैस की प्रकृति की वैज्ञानिक जांच के साथ हवा में धूलकणों की मात्रा की जांच, नियमित एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग, पानी का छिड़काव और धूल नियंत्रण के प्रभावी उपाय करने की मांग की है.
कोयला उत्पादन जरूरी है, लेकिन विकास की कीमत लोगों की सांसों से नहीं वसूली जा सकती. डकरा परियोजना प्रबंधन को अब यह स्पष्ट करना होगा कि माइनिंग के दौरान निकलने वाली गैस और उड़ने वाले डस्ट से आम लोगों को कितना जोखिम है और उससे बचाव के लिए क्या ठोस व्यवस्था की गई है.
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