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रांची/डेस्क: हजारीबाग जिले की चट्टी बरियातू कोयला खनन परियोजना पिछले दो वर्षों से बार-बार परिचालन बाधाओं का सामना कर रही है. जिसके कारण अब तक 224 करोड़ रुपये से अधिक का वित्तीय नुकसान हो चुका है. एनटीपीसी माइनिंग लिमिटेड द्वारा संचालित इस खदान ने अप्रैल 2022 में परिचालन शुरू किया था और अप्रैल 2024 में इसे व्यावसायिक रूप से चालू घोषित किया गया. हालांकि, लगातार हो रहे व्यवधानों के कारण यह परियोजना अपनी निर्धारित 7 मिलियन टन प्रति वर्ष की क्षमता तक नहीं पहुंच पाई है. हाल के महीनों में विरोध प्रदर्शनों की आवृत्ति और बढ़ गई है, जिसके चलते कोयला उत्पादन पूरी तरह ठप हो गया है.
व्यवधानों का नेतृत्व कर रहे पूर्व विधायक योगेंद्र साव
हालिया व्यवधानों का नेतृत्व पूर्व विधायक योगेंद्र साव द्वारा किया जा रहा है. इनमें खदान परिसर में धरना प्रदर्शन, कर्मचारियों को धमकाना, बिजली संयंत्रों तक कोयला परिवहन मार्गों को अवरुद्ध करना, सड़क जाम करना, मशीनरी को खदान में प्रवेश से रोकना, ठेकेदारों के वाहनों को डराना तथा समूहों को संगठित कर परिचालन ठप कराना शामिल है. इन व्यवधानों के कारण झारखंड राज्य सरकार को भारी राजस्व नुकसान हुआ है. उत्पादित न हो पाने वाले प्रत्येक टन कोयले से राज्य को लगभग 1,026 रुपये के वैधानिक शुल्क का नुकसान होता है. यह राजस्व झारखंड में अस्पतालों, स्कूलों, सड़कों और अन्य जनकल्याणकारी परियोजनाओं के लिए उपयोग किया जा सकता था.
रोजगार पर पड़ रहा स्थिति का प्रभाव
स्थिति का प्रभाव रोजगार पर भी पड़ा है. खनन परिचालन से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े सैकड़ों श्रमिकों को बंदी के दौरान अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है. चट्टी बरियातू खदान से बरह और नॉर्थ करणपुरा स्थित ताप विद्युत संयंत्रों को कोयला आपूर्ति की जाती है, जो झारखंड और आसपास के क्षेत्रों को बिजली प्रदान करते हैं. उत्पादन रुकने पर इन बिजली घरों को या तो उत्पादन घटाना पड़ता है या अधिक लागत पर वैकल्पिक स्रोतों से कोयला मंगाना पड़ता है, जिसका सीधा असर उपभोक्ताओं पर बढ़े हुए बिजली बिल के रूप में पड़ता है. एनटीपीसी माइनिंग लिमिटेड ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत निर्धारित प्रावधानों से अधिक मुआवजा पैकेज लागू किए हैं. आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, कंपनी ने विस्थापित परिवारों को बढ़ी हुई वार्षिकी और अतिरिक्त मौद्रिक लाभ प्रदान किए हैं.
ऊर्जा सुरक्षा भारत की आत्मनिर्भरता की दृष्टि की रीढ़ है. इस प्रकार के लगातार व्यवधानों का अंतिम प्रभाव आम नागरिकों पर पड़ता है, जो किफायती बिजली पर निर्भर हैं. आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए स्थानीय समुदायों, नागरिक समाज संगठनों, राजनीतिक प्रतिनिधियों और सरकारी एजेंसियों के बीच सहयोग आवश्यक है, ताकि विकास के लाभ सभी तक पहुंच सकें. हालांकि, चट्टी बरियातू में पूर्व विधायक योगेंद्र साव के नेतृत्व में जारी व्यवधान सामुदायिक कल्याण की बजाय राजनीतिक हितों की पूर्ति करते प्रतीत होते हैं और भारत की प्रगति तथा ऊर्जा सुरक्षा के लक्ष्यों के विरुद्ध काम कर रहे हैं.
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