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दुमका/डेस्क: साहिबगंज में सामने आए चर्चित खनन मामलों के बाद अब दुमका जिले के शिकारीपाड़ा क्षेत्र में भी अवैध और नियमविरुद्ध खनन को लेकर सवाल उठने लगे हैं. स्थानीय ग्रामीणों और प्रभावित रैयतों का आरोप है कि इलाके में लंबे समय से बड़े पैमाने पर पत्थर खनन हुआ है, जिससे सरकारी और गोचर भूमि को भारी नुकसान पहुंचा है. मामले की केंद्रीय एजेंसियों से जांच कराने की मांग भी जोर पकड़ रही है.
गोचर भूमि पर खनन का आरोप
स्थानीय लोगों के अनुसार, मकड़ा पहाड़ी क्षेत्र में दर्ज गोचर भूमि का बड़ा हिस्सा कथित रूप से खनन की भेंट चढ़ गया है. ग्रामीणों का दावा है कि जिन स्थानों पर कभी चारागाह और प्राकृतिक हरियाली थी, वहां अब गहरे खनन गड्ढे दिखाई देते हैं. ग्रामीणों ने कुछ प्रभावशाली लोगों पर लंबे समय तक कथित रूप से अवैध खनन गतिविधियों को संचालित करने का आरोप लगाया है. उनका कहना है कि इस दौरान निकाले गए पत्थरों के कारोबार से बड़े पैमाने पर आर्थिक लाभ अर्जित किया गया. हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि अभी बाकी है. स्थानीय लोगों का यह भी दावा है कि खनन से अर्जित कथित रकम को आसपास के अन्य खदान क्षेत्रों में लगाया गया. ग्रामीणों ने चित्रागढ़िया और सालबोना सहित दूसरे इलाकों में होने वाली खनन गतिविधियों की भी विस्तृत जांच की मांग की है.
धूल और ब्लास्टिंग से खेती प्रभावित होने का दावा
खनन क्षेत्र के आसपास रहने वाले आदिवासी और अन्य रैयतों ने पर्यावरणीय नुकसान को लेकर भी चिंता जताई है. उनका कहना है कि क्रशर से निकलने वाली धूल के कारण खेतों की उत्पादकता प्रभावित हो रही है. ग्रामीणों के मुताबिक, कई स्थानों पर धूल नियंत्रण के लिए नियमित पानी का छिड़काव नहीं किया जाता. इसके अलावा ब्लास्टिंग और क्रशर संचालन से भी स्थानीय आबादी को परेशानी होने का आरोप लगाया गया है. कुछ रैयतों ने आरोप लगाया कि खनन से जुड़े लोगों के खिलाफ शिकायत करने पर उन्हें दबाव और धमकी का सामना करना पड़ता है. ग्रामीणों का कहना है कि प्रभावशाली खनन कारोबारियों के कारण उनकी शिकायतों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हो पाती. इन आरोपों की भी आधिकारिक पुष्टि होना बाकी है.
ड्रोन सर्वे से सामने आ सकती है खनन की वास्तविक तस्वीर
सहरपुर और सालबोना क्षेत्र में खनन को लेकर खबरें सामने आने के बाद प्रशासन की ओर से कुछ लीज क्षेत्रों की जांच के लिए ड्रोन सर्वे का सहारा लिए जाने की बात सामने आई है. ग्रामीणों का मानना है कि यदि खदानों की गहराई, क्षेत्रफल और वास्तविक उत्खनन का तकनीकी मिलान स्वीकृत लीज और पर्यावरणीय मानकों से किया जाए, तो कथित अनियमितताओं की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है. स्थानीय लोगों ने मांग की है कि खनन क्षेत्रों का ड्रोन मैपिंग डेटा, स्वीकृत लीज क्षेत्र और वास्तविक उत्खनन की मात्रा का वैज्ञानिक तरीके से मिलान कराया जाए. इससे सरकारी राजस्व को संभावित नुकसान का भी आकलन किया जा सकता है.
क्षमता से अधिक खनन और ओवरलोडिंग के आरोप
पहाड़पुर मौजा में संचालित कुछ लीज खदानों को लेकर भी ग्रामीणों ने गंभीर आरोप लगाए हैं. उनका दावा है कि स्वीकृत क्षमता की तुलना में अधिक मात्रा में खनन और ब्लास्टिंग की जा रही है. वाहनों में कथित ओवरलोडिंग को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं. ग्रामीणों का आरोप है कि पूर्व में नियमों के उल्लंघन से जुड़े विवादों के बावजूद कुछ संचालकों को दोबारा खनन की अनुमति या लीज मिलने की प्रक्रिया की भी जांच होनी चाहिए. उनका कहना है कि लीज की शर्तों, उत्पादन सीमा, रॉयल्टी भुगतान और वास्तविक खनन की मात्रा की स्वतंत्र जांच जरूरी है.
कैश लेनदेन की जांच की मांग
खनन कारोबार से जुड़े कथित बड़े नकद लेनदेन की जांच की मांग भी स्थानीय स्तर पर उठ रही है. प्रभावित रैयतों का दावा है कि सप्ताह के कुछ खास दिनों में बड़े पैमाने पर नकद कारोबार होता है. उन्होंने संबंधित जांच एजेंसियों से बैंक खातों, रॉयल्टी रिकॉर्ड, परिवहन दस्तावेज, उत्पादन आंकड़ों और अन्य वित्तीय लेनदेन का मिलान कराने की मांग की है. ग्रामीणों का कहना है कि यदि खदान से निकले पत्थर की वास्तविक मात्रा और घोषित उत्पादन का वित्तीय रिकॉर्ड से मिलान किया जाए, तो संभावित राजस्व नुकसान का पता लगाया जा सकता है.
ED और CBI जांच की मांग
शिकारीपाड़ा में खनन से जुड़े आरोपों को लेकर स्थानीय रैयतों और ग्रामीणों ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) तथा केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) जैसी एजेंसियों से जांच की मांग की है. उनका कहना है कि मामले में सिर्फ खदानों का निरीक्षण पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि लीज आवंटन, उत्पादन, रॉयल्टी भुगतान, परिवहन, कंपनियों और कथित वित्तीय लेनदेन की भी व्यापक जांच होनी चाहिए.