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रांची/डेस्क: रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने करीब 28 साल पुराने हत्या के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कोमल खलखो और जॉन मिंज की सजा को रद्द कर दिया है. दोनों आरोपियों को निचली अदालत ने वर्ष 1998 में भारतीय दंड संहिता की धारा 302/34 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कठोर कारावास की सजा सुनाई थी. हाईकोर्ट के न्यायाधीश सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायाधीश संजय प्रसाद की खंडपीठ ने अपील पर सुनवाई करते हुए माना कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ हत्या का आरोप संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं रहा.
मामला रांची जिले के मांडर थाना क्षेत्र का है और घटना 11 अप्रैल 1993 की बताई गई है. अभियोजन के अनुसार, बालेश्वर ठाकुर अपने पिता बलदेव ठाकुर की हेयर कटिंग सैलून में काम करता था. घटना के दिन वह घर से निकलने के बाद वापस नहीं लौटा. अगले दिन उसके शव के खेत में पड़े होने की सूचना परिवार को मिली. शव के गले में रस्सी बंधी हुई थी. इसके बाद मांडर थाना में अज्ञात लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी.
जांच के बाद पुलिस ने कोमल खलखो और जॉन मिंज के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया. निचली अदालत ने दोनों को धारा 302/34 के तहत दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी. इसके खिलाफ दोनों ने हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दाखिल की थी.
गवाहों का आरोप - पुलिस ने धमकाकर आरोपियों के खिलाफ बयान देने के लिए किया मजबूर
हाईकोर्ट के सामने मामले में अभियोजन के दो कथित चश्मदीद गवाहों की गवाही महत्वपूर्ण रही. दोनों ने मजिस्ट्रेट के सामने धारा 164 सीआरपीसी के तहत दिए गए अपने पुराने बयानों से ट्रायल के दौरान मुकरते हुए कहा कि उन्होंने घटना को नहीं देखा था. दोनों गवाहों ने आरोप लगाया कि पुलिस अधिकारी ने उन्हें धमकाकर आरोपियों के खिलाफ बयान देने के लिए मजबूर किया था. अभियोजन ने दोनों गवाहों को hostile घोषित किया.
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 164 सीआरपीसी के तहत दर्ज बयान अपने आप में substantive evidence यानी किसी तथ्य को साबित करने वाला स्वतंत्र साक्ष्य नहीं होता. ऐसे बयान का इस्तेमाल मुख्य रूप से गवाह की अदालत में दी गई गवाही की पुष्टि या विरोधाभास दिखाने के लिए किया जा सकता है. यदि कोई गवाह बाद में अदालत में अपने पुराने बयान से मुकर जाता है, तो केवल उसी पुराने बयान के आधार पर आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता.
पिता ने बेटे पर किसी को हमला करते नहीं देखा
अदालत ने यह भी पाया कि मृतक के पिता और मामले के सूचक बलदेव ठाकुर स्वयं घटना के प्रत्यक्षदर्शी नहीं थे. उन्होंने अदालत में स्वीकार किया कि उन्होंने अपने बेटे पर किसी को हमला करते हुए नहीं देखा था. वहीं प्राथमिकी में भी दोनों अपीलकर्ताओं के नाम नहीं थे. हाईकोर्ट ने इन परिस्थितियों को मामले के साक्ष्य के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण माना.
पोस्टमार्टम रिपोर्ट से यह जरूर साबित हुआ कि बालेश्वर ठाकुर की मौत हत्या की प्रकृति की थी. डॉक्टर ने गले पर ligature mark पाया था और मौत का कारण गर्दन पर दबाव के कारण दम घुटना बताया था. हालांकि, अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि हत्या किसने की और क्या उपलब्ध साक्ष्यों से दोनों अपीलकर्ताओं की भूमिका कानूनी रूप से साबित होती है.
हाईकोर्ट ने कहा कि जब प्रत्यक्षदर्शी गवाहों की गवाही विश्वसनीय आधार नहीं बनती, तो परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर दोषसिद्धि के लिए परिस्थितियों की पूरी और ऐसी श्रृंखला होना आवश्यक है जो आरोपी के अपराध की ओर निर्णायक रूप से इशारा करे तथा निर्दोष होने की उचित संभावना को समाप्त करे. अदालत ने इस सिद्धांत के लिए सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का उल्लेख किया.
पंचायत के दस्तावेज ट्रायल में नहीं किए गए पेश
इस मामले में हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और गवाहों की गवाही का परीक्षण करते हुए निचली अदालत द्वारा धारा 164 के बयानों पर की गई निर्भरता को कानून के अनुरूप नहीं माना. अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि कथित पंचायत के जिस दस्तावेज का उल्लेख गवाहों ने किया था, वह ट्रायल में प्रदर्शित ही नहीं हुआ और पंचायत में मौजूद बताए गए अधिकांश लोगों को भी अभियोजन ने गवाह के रूप में पेश नहीं किया.
इस आधार पर हाईकोर्ट ने दोनों आरोपियों के खिलाफ दोषसिद्धि को बनाए रखने के लिए पर्याप्त कानूनी साक्ष्य नहीं पाया और उनकी अपील स्वीकार करते हुए निचली अदालत के फैसले और सजा को रद्द कर दिया.