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रांची/डेस्क: झारखंड हाईकोर्ट ने लोहरदगा के एक हत्या मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे गुलाम गौश अंसारी को राहत दी है. कोर्ट ने कहा कि सिर्फ घटना वाले दिन दोपहर में पीड़ित के घर जाना या सह-आरोपी से फोन पर बातचीत होना, हत्या की साजिश में शामिल होने का पुख्ता सबूत नहीं माना जा सकता. न्यायाधीश सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायाधीश अनुभा रावत चौधरी की खंडपीठ ने मुख्य अपील लंबित रहने के दौरान गुलाम गौश की सजा को निलंबित करते हुए उसे नियमित जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया.
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा मामला लोहरदगा जिले के कुड़ू थाना क्षेत्र (S.T. केस नंबर 51/2018) से जुड़ा है. साल 2017 में धान खरीदने के बहाने एक युवक को नदी के पास ले जाकर गोली मार दी गई थी, जिसकी इलाज के दौरान मौत हो गई. मरने से पहले घायल युवक ने अपने परिजनों को बताया था कि 'मुकेश' नाम के लड़के ने उस पर गोली चलाई है. पुलिस जांच में सामने आया कि मुकेश का असली नाम अबरिक अंसारी उर्फ छोटू था.
साल 2020 में लोहरदगा की अतिरिक्त सत्र अदालत ने इस मामले में मुख्य शूटर अबरिक अंसारी, गुलाम गौश अंसारी, आलोक अग्रवाल और शकील अंसारी को हत्या और आपराधिक साजिश का दोषी पाते हुए आजीवन कारावास (उम्रकैद) और 30 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी. इस फैसले को आरोपियों ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी.
हाईकोर्ट में क्या सामने आया?
जब पीड़ित घायल और होश में था, तो उसने अपनी मां और बहनों के सामने हमलावरों के नाम लिए थे. उसने अबरिक (मुकेश) और आलोक अग्रवाल सहित कई लोगों के नाम बताए, लेकिन पूरे बयान में गुलाम गौश अंसारी का कहीं कोई नाम नहीं था.
गवाहों के अनुसार, गुलाम गौश दोपहर में धान बेचने की बात करने के लिए पीड़ित के घर जरूर गया था. लेकिन हत्या की वारदात शाम को नदी किनारे हुई, जहां गुलाम गौश की मौजूदगी का कोई सबूत नहीं मिला. कोर्ट ने कहा कि सिर्फ दोपहर में मिलने जाने से हत्या का कनेक्शन साबित नहीं होता.
पुलिस ने दावा किया था कि घटना में उपयोग सफेद रंग की प्लेटिना मोटरसाइकिल गुलाम गौश के पास से मिली है. लेकिन जांच अधिकारी (IO) ने खुद माना कि जांच के दौरान न तो ऐसी किसी बाइक के मालिक की पहचान हो सकी और न ही कोई बाइक बरामद हुई.
10 हजार के बेल बॉन्ड पर रिहाई का आदेश
उच्च न्यायालय ने पाया कि मुख्य शूटर अबरिक के साथ केवल फोन पर बात होने (सीडीआर रिपोर्ट) के अलावा गुलाम गौश के खिलाफ कोई सीधा सबूत नहीं है. इसे देखते हुए अदालत ने गुलाम गौश अंसारी को 10,000 रुपये के बेल बॉन्ड और दो स्थानीय गारंटरों (जमानतदारों) की शर्त पर रिहा करने का आदेश दिया. कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इस जमानत आदेश की टिप्पणियां केवल सजा निलंबन तक सीमित हैं और मुख्य क्रिमिनल अपील पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा.
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