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रांची/डेस्क: नवरात्रि का पावन पर्व जारी है और आज चौथे दिन भक्त मां कुष्मांडा की आराधना कर रहे हैं. हिंदू धर्म में मां कुष्मांडा को सृष्टि की आदिस्वरूपा और ऊर्जा का स्रोत माना जाता हैं. ऐसी मान्यता है कि देवी कुष्मांडा की आराधना से भक्तों को आयु, यश, बल और समृद्धि की प्राप्ति होती हैं. इस दिन विशेष रूप से देवी के आशीर्वाद से मानसिक और शारीरिक कष्टों का नाश होता हैं. मां कुष्मांडा का स्वरूप अत्यंत तेजस्वी और चमत्कारी हैं. इनके आठ हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल का फूल, अमृत कलश, चक्र, गदा और जप माला सुशोभित होते हैं. यह सिंह पर विराजमान होती है और भक्तों को भयमुक्त करने वाली देवी के रूप में पूजी जाती हैं. इनके स्मरण मात्र से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता हैं.
पूजा का महत्व और लाभ
मां कुष्मांडा की उपासना से भक्तों के जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती हैं. मान्यता है कि उनकी कृपा से सभी प्रकार के रोगों का नाश होता है और व्यक्ति को आरोग्यता की प्राप्ति होती हैं. विशेष रूप से देवी की उपासना करने से दीघार्यु, यश और कीर्ति की प्राप्ति होती हैं. इस दिन भक्त मां को सफेद वस्त्र, सफेद फूल और कद्दू का भोग अर्पित कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं.
कैसे करें मां कुष्मांडा की पूजा?
- स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें.
- मां कुष्मांडा की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर उनका ध्यान करें.
- जल और पंचामृत से मां को स्नान कराएं.
- मां को सुंदर वस्त्र, आभूषण और माला अर्पित करें.
- मां को कद्दू, नारियल, मिष्ठान और फल अर्पित करें.
- मां की आरती करें और 'ॐ कुष्मांडा देव्यै नम:' मंत्र का जाप करें.
- पूजा के बाद प्रसाद वितरित करें और परिवार व मित्रों के साथ शुद्धता साझा करें.
मां कुष्मांडा के मंत्र
देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
बीज मंत्र
कुष्मांडा: ऐं ह्री देव्यै नम:
पूजा मंत्र
ऊं कुष्माण्डायै नम:
ध्यान मंत्र
वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्। सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम्॥
मां कुष्मांडा देवी स्तोत्र
वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढा अष्टभुजा कूष्मांडा यशस्वनीम्॥
भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्।
कमण्डलु चाप, बाण, पदमसुधाकलश चक्र गदा जपवटीधराम्॥
पटाम्बर परिधानां कमनीया कृदुहगस्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर हार केयूर किंकिण रत्नकुण्डल मण्डिताम्।
प्रफुल्ल वदनां नारू चिकुकां कांत कपोलां तुंग कूचाम्।
कोलांगी स्मेरमुखीं क्षीणकटि निम्ननाभि नितम्बनीम् ॥
स्त्रोत
दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दारिद्रादि विनाशिनीम्।
जयंदा धनदां कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
जगन्माता जगतकत्री जगदाधार रूपणीम्।
चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
त्रैलोक्यसुंदरी त्वंहि दु:ख शोक निवारिणाम्।
परमानंदमयी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
देवी कवच
हसरै मे शिर: पातु कूष्माण्डे भवनाशिनीम्।
हसलकरीं नेत्रथ, हसरौश्च ललाटकम्॥
कौमारी पातु सर्वगात्रे वाराही उत्तरे तथा।
पूर्वे पातु वैष्णवी इन्द्राणी दक्षिणे मम।
दिग्दिध सर्वत्रैव कूं बीजं सर्वदावतु॥
मां कुष्मांडा की आरती
कूष्मांडा जय जग सुखदानी।
मुझ पर दया करो महारानी॥
पिगंला ज्वालामुखी निराली।
शाकंबरी माँ भोली भाली॥
लाखों नाम निराले तेरे ।
भक्त कई मतवाले तेरे॥
भीमा पर्वत पर है डेरा।
स्वीकारो प्रणाम ये मेरा॥
सबकी सुनती हो जगदंबे।
सुख पहुँचती हो माँ अंबे॥
तेरे दर्शन का मैं प्यासा।
पूर्ण कर दो मेरी आशा॥
माँ के मन में ममता भारी।
क्यों ना सुनेगी अरज हमारी॥
तेरे दर पर किया है डेरा।
दूर करो माँ संकट मेरा॥
मेरे कारज पूरे कर दो।
मेरे तुम भंडारे भर दो॥
तेरा दास तुझे ही ध्याए।
भक्त तेरे दर शीश झुकाए॥