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रांची/डेस्क: झारखंड उच्च न्यायालय ने देवघर के एक 15 साल पुराने चर्चित चाकूबाजी के मामले में बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने माना कि आरोपी ने किसी पुरानी दुश्मनी या जान लेने की नीयत से हमला नहीं किया था, बल्कि यह अचानक हुए एक मामूली झगड़े का नतीजा था. इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा दोषी को दी गई 7 साल की जेल की सजा को बदल दिया है. न्यायाधीश अरुण कुमार राय की कोर्ट ने न्याय का ध्यान रखते हुए आदेश दिया कि दोषी पहले ही जितने महीने जेल में रह चुका है, उसी को उसकी पूरी सजा माना जाए और उसे रिहा किया जाए.
क्या था पूरा मामला?
यह घटना देवघर जिले के मार्गोमुंडा थाना क्षेत्र की है. जून 2011 की दोपहर मोहम्मद समीउद्दीन अंसारी मिठाई की दुकान पर गया और उसने 22 रुपये का नाश्ता किया. जब दुकानदार सुशांत डे ने नाश्ते के पैसे मांगे, तो समीउद्दीन ने कहा कि वह मुफ्त में नाश्ता करता है और शाम को सबक सिखाने की धमकी देकर चला गया. उसी शाम वह चाकू लेकर दोबारा दुकान पर धमका और दुकानदार पर हमला कर दिया, जिससे उसकी जांघ और सिर पर चोटें आईं. बीच-बचाव करने आए दुकानदार के भाई और भतीजे भी इस हमले में घायल हो गए थे.
साल 2017 में देवघर की अदालत ने आरोपी को जान से मारने की कोशिश और गल्ले से पैसे चुराने का दोषी पाते हुए 7 साल की जेल और 5,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की गई थी.
हाई कोर्ट ने क्यों बदली सजा?
हाई कोर्ट ने जब मामले के सबूतों और डॉक्टर की रिपोर्ट को दोबारा देखा, तो फैसले में बड़े बदलाव किए. डॉक्टर की रिपोर्ट के अनुसार, घायलों की चोटें मामूली थीं और कोई भी घाव जानलेवा नहीं था. दुकानदार और आरोपी के बीच पहले से कोई दुश्मनी भी नहीं थी. कोर्ट ने माना कि यह घटना अचानक हुए विवाद में गुस्से का नतीजा थी, इसलिए जान से मारने की कोशिश का गंभीर आरोप हटाकर इसे हथियार से चोट पहुंचाने के मामले में बदल दिया गया.
दुकानदार ने आरोप लगाया था कि हमलावर गल्ले से 2,000 रुपये लूट ले गया था. लेकिन कोर्ट ने पाया कि जब मौके पर दुकानदार का भाई और भतीजा मौजूद थे और भीड़ जमा थी, तो ऐसे में पैसे चुराने का मौका मिलना मुमकिन नहीं लगता. बयानों में अंतर होने के कारण कोर्ट ने उसे चोरी के आरोप से पूरी तरह मुक्त कर दिया.
हाई कोर्ट का का अंतिम आदेश
उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि यह घटना साल 2011 की है और आरोपी पिछले 15 सालों से कोर्ट-कचहरी के चक्कर काट रहा है. वह पहले ही लगभग 4 महीने जेल में बिता चुका है. कोर्ट ने समय और परिस्थितियों को देखते हुए उसकी जेल की सजा को घटाकर 'अब तक काटी गई अवधि' में बदल दिया, हालांकि उस पर लगा जुर्माना बरकरार रखा. चूंकि आरोपी पहले से जमानत पर बाहर है, इसलिए उसे अदालती बंधनों से पूरी तरह आजाद कर दिया गया.