हाई कोर्ट
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हर 'Breach of Promise' रेप नहीं, शादी से मुकर जाना 'झूठा वादा' नहीं माना जा सकता: हाई कोर्ट

कोर्ट ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति परिस्थितियों या परिवार के विरोध के कारण शादी नहीं कर पाता है, तो इसे जबरन सहमति हासिल करने का 'झूठा वादा' नहीं कहा जा सकता.

By : Ark Sahuliyar
हर 'Breach of Promise' रेप नहीं, शादी से मुकर जाना 'झूठा वादा' नहीं माना जा सकता: हाई कोर्ट

न्यूज़11 भारत 
रांची/डेस्क:
झारखंड उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि शादी का वादा पूरा न कर पाना (Breach of Promise) और शुरू से ही शादी का झूठा नाटक करना (False Promise), दोनों में बड़ा कानूनी अंतर है. कोर्ट ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति परिस्थितियों या परिवार के विरोध के कारण शादी नहीं कर पाता है, तो इसे जबरन सहमति हासिल करने का 'झूठा वादा' नहीं कहा जा सकता. इस अहम टिप्पणी के साथ अदालत ने खूंटी जिले के एक स्कूल शिक्षक को दुष्कर्म के आरोपों से पूरी तरह बरी कर दिया और निचली अदालत द्वारा दी गई 7 साल की जेल की सजा को रद्द कर दिया.

क्या है पूरा मामला?
मामला खूंटी जिला के तोरपा का है, जहां एक स्कूल शिक्षक अनूप एक्का पर एक युवती ने साल 2015 में आरोप लगाया था कि आरोपी ने शादी का झांसा देकर उसके साथ दुष्कर्म किया. पीड़िता के अनुसार, वह जनवरी 2015 में आरोपी के घर उसकी मां से मिलने गई थी, जहां आरोपी ने उसके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए और रोने पर शादी करने का आश्वासन दिया. इसके बाद मई 2015 में शिक्षक ने पीड़िता के घर जाकर उसके माता-पिता के सामने शादी की इच्छा भी जताई थी, लेकिन बाद में जून 2015 में उसने शादी करने से मना कर दिया. साल 2016 में खूंटी की निचली अदालत ने आरोपी को दोषी करार देते हुए 7 साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की गई थी.

मर्जी से शारीरिक संबंध बनाना दुष्कर्म नहीं
न्यायाधीश अरुण कुमार राय की एकल पीठ ने मामले के तथ्यों और पीड़िता के क्रॉस-एग्जामिनेशन की समीक्षा करते हुए कई महत्वपूर्ण बिंदुओं को रेखांकित करते हुए पाया कि दुष्कर्म की पहली कथित घटना के बाद, आरोपी खुद लड़की के घर गया और उसके माता-पिता के सामने शादी का प्रस्ताव रखा. यह साबित करता है कि शुरू से उसकी नीयत धोखेबाजी की नहीं थी.

पीड़िता ने खुद अदालत में स्वीकार किया था कि आरोपी की मां इस शादी के खिलाफ थीं और उनके दबाव में आकर ही आरोपी ने कदम पीछे खींचे. इसलिए, यह सिर्फ शादी के वादे से मुकरने (Breach of Promise) का मामला है, न कि दुर्भावनापूर्ण नीयत का.

कोर्ट ने नोट किया कि पीड़िता बालिग थी और पहली घटना के बाद वह दोबारा अपनी मर्जी से आरोपी के घर गई और वहां रुकी, जहां दोनों के बीच आपसी सहमति से संबंध बने.

अदालत का अंतिम आदेश
उच्च न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के स्थापित न्यायिक सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि जब तक यह साबित न हो कि शारीरिक संबंध पूरी तरह से शादी के झूठे झांसे की वजह से बने थे, तब तक इसे सहमति का उल्लंघन नहीं माना जा सकता. अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ दुष्कर्म के आवश्यक तत्वों को साबित करने में विफल रहा है. हाई कोर्ट ने अनूप एक्का की अपील को पूरी तरह स्वीकार करते हुए दोषसिद्धि के आदेश को खारिज कर दिया और उन्हें जमानत बांड की सभी देनदारियों से मुक्त करने का निर्देश दिया.

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