मुमताज अहमद/न्यूज11 भारत
खलारी/डेस्क: रांची उपायुक्त मंजूनाथ भजंत्री के सख्त निर्देशों के बावजूद खलारी प्रखंड के कई निजी विद्यालयों में स्कूल प्रांगण के अंदर ही किताबें और अन्य शैक्षणिक सामग्री खुलेआम बेची जा रही हैं. प्रशासनिक आदेशों को दरकिनार कर स्कूल प्रबंधन एमआरपी दर पर किताबें, यूनिफॉर्म और अन्य सामग्री बेच रहे हैं, जिससे अभिभावकों को मजबूरी में ऊंची कीमतों पर खरीदारी करनी पड़ रही है.
जानकारी के अनुसार खलारी प्रखंड के उर्स लाइन कॉन्वेंट स्कूल, डीएवी पब्लिक स्कूल, डॉन बॉस्को, रॉयल प्रोग्रेसिव डकरा समेत कई निजी विद्यालयों के परिसर के अंदर ही किताबों और पाठ्यक्रम से संबंधित वस्तुओं की बिक्री धड़ल्ले से हो रही है. अभिभावकों को सीमित समय में स्कूल परिसर में लंबी कतार लगाकर किताबें खरीदनी पड़ रही हैं.
इस संबंध में जब स्थानीय संवाददाता ने बाजारटांड़ स्थित उर्स लाइन कॉन्वेंट स्कूल के प्रिंसिपल से वार्ता कर जानकारी ली तो उन्होंने जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए कहा कि इस विषय में अभिभावकों से ही पूछ लिया जाए और यह व्यवस्था वर्षों से चलती आ रही है.
अभिभावकों ने पहले से सूचना नहीं देने के लगाया आरोप
वहीं मजदूरी करने वाले कई अभिभावकों ने बताया कि उन्हें पहले से किसी प्रकार की स्पष्ट सूचना नहीं दी जाती. साथ ही स्थानीय बाजार या पुस्तक दुकानों पर इन स्कूलों की किताबें भी उपलब्ध नहीं होती हैं. ऐसे में अभिभावक मजबूर होकर स्कूल परिसर से ही किताबें, यूनिफॉर्म और अन्य पाठ्य सामग्री खरीदने को विवश हैं.
अभिभावकों का कहना है कि अधिकांश निजी विद्यालय अपने परिसर में ही किताबों के साथ-साथ तीन से चार सेट यूनिफॉर्म, जूते, टाई, ब्लेजर और अन्य सामग्री भी बेचते हैं, जिससे उन पर आर्थिक बोझ और बढ़ जाता है.
रसीद में “आयुष बुक सेंटर खलारी” का नाम
मामले ने तब नया मोड़ ले लिया जब उर्सलाइन कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ने वाले एक छात्र के अभिभावक को दी गई किताबों की रसीद में विक्रेता का नाम “आयुष बुक सेंटर, खलारी” दर्ज पाया गया. जांच पड़ताल में पता चला कि खलारी क्षेत्र में इस नाम का कोई बुक सेंटर मौजूद ही नहीं है जो उक्त विद्यालय की किताबें बेचता हो.
बताया जाता है कि रसीद में दिए गए संपर्क नंबर पर जब संवाददाता ने फोन कर जानकारी ली तो पता चला कि किताबों की सप्लाई रांची से की जाती है. विक्रेता ने बताया कि वह रांची से किताबें भेजता है और बिक्री के लिए विद्यालय को उपलब्ध कराता है. इसके बाद विद्यालय परिसर में ही किताबों की बिक्री की जाती है.
स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस व्यवस्था के जरिए विद्यालय प्रबंधन किताबों की बिक्री पर कमीशन भी ले रहा है. इससे अभिभावकों को गुमराह किया जा रहा है और ऐसा दिखाया जा रहा है मानो स्थानीय बुक सेंटर से किताबें खरीदी जा रही हों.
घंटों लाइन में खड़े होने को मजबूर अभिभावक
अभिभावकों का कहना है कि अधिकांश निजी विद्यालय अपने परिसर में ही किताबों के साथ-साथ तीन से चार सेट यूनिफॉर्म, जूते, टाई और ब्लेजर भी बेचते हैं. कई मजदूर परिवारों के अभिभावकों ने बताया कि न तो उन्हें पहले से कोई स्पष्ट सूचना दी जाती है और न ही स्थानीय बाजार में इन स्कूलों की किताबें उपलब्ध होती हैं. ऐसे में उन्हें मजबूर होकर स्कूल परिसर से ही किताबें खरीदनी पड़ती हैं.
उपायुक्त का आदेश भी बेअसर
गौरतलब है कि 20 मार्च 2026 को रांची में जारी एक आदेश के अनुसार उपायुक्त मंजूनाथ भजंत्री ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि किसी भी निजी विद्यालय के परिसर या भवन के अंदर किताबों की बिक्री नहीं की जाएगी. आदेश का उल्लंघन करने वाले विद्यालयों पर 50 हजार से 2.5 लाख रुपये तक जुर्माना और कड़ी कार्रवाई के साथ मान्यता रद्द करने तक की बात कही गई थी.
अधिकारी भी स्पष्ट जवाब देने से बचते नजर आए
जब इस मामले में खलारी प्रखंड विकास पदाधिकारी सह अंचलाधिकारी प्रणव कुमार अम्बष्ट से जानकारी लेने की कोशिश की गई तो उन्होंने कहा कि इस विषय में शिक्षा विभाग से जानकारी ली जाए.
वहीं प्रखंड कार्यक्रम शिक्षा पदाधिकारी सरवरी नाथ चौरसिया ने बताया कि जिला स्तर से इस संबंध में कोई लिखित पत्राचार उन्हें प्राप्त नहीं हुआ है, इसलिए कार्रवाई संभव नहीं है. उन्होंने यह भी कहा कि निजी विद्यालयों में इस तरह की व्यवस्था लंबे समय से चलती आ रही है.
मामले को लेकर जिला पीआरडी सुमीत कुमार से संपर्क करने पर उन्होंने कहा कि यदि अभिभावक लिखित शिकायत करते हैं तो संबंधित विद्यालयों पर कानूनी कार्रवाई की जा सकती है.
शिकायत करें तो बच्चों पर पड़ता है असर - ग्रामीण
ग्रामीणों का कहना है कि सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था पर भरोसा कम होने के कारण लोग मजबूर होकर बच्चों को निजी विद्यालयों में दाखिला कराते हैं. लेकिन नामांकन शुल्क, भवन शुल्क, वार्षिक शुल्क, वाहन शुल्क, किताबें और यूनिफॉर्म के नाम पर मोटी रकम वसूल कर निजी विद्यालय अभिभावकों पर आर्थिक बोझ बढ़ा रहे हैं.
अभिभावकों का कहना है कि वे बेहतर शिक्षा की उम्मीद में बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाते हैं, लेकिन यदि विद्यालय की व्यवस्था के खिलाफ शिकायत करें तो बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होने का डर बना रहता है. कई अभिभावकों ने आरोप लगाया कि शिकायत करने पर विद्यालय प्रबंधन द्वारा बच्चों के साथ भेदभाव या प्रताड़ना की आशंका बनी रहती है.
अब बड़ा सवाल यह है कि जब सरकारी आदेश के बावजूद स्कूल परिसर में खुलेआम किताबों की बिक्री जारी है और अधिकारी भी स्पष्ट कार्रवाई की स्थिति में नहीं हैं, तो अभिभावक आखिर शिकायत करें तो किससे करें? यह मामला शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़ा कर रहा है.
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