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जमशेदपुर/डेस्क: झारखंड में स्थित प्राचीन सोलहभुजी दिउड़ी मंदिर सिर्फ राज्य ही नहीं बल्कि पूरे देश के श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है.यहां झारखंड, बिहार, बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश सहित देश के अन्य राज्यों से भी भक्त माता के दर्शन के लिए आते हैं.
नवरात्र में विशेष आयोजन और बलि प्रथा
शारदीय नवरात्र के दौरान, नौ दिनों तक इस मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन किया जाता है.परंपरा के अनुसार, यहां नवमी की पूजा के बाद सैकड़ों बकरों के साथ भैंसे की भी बलि दी जाती है. मंदिर के पुजारी बताते है कि इस वर्ष दशमी को दो अक्तूबर होने के कारण दशमी के दिन बलि नहीं चढ़ाई जाएगी. उन्होंने भक्तों से आग्रह किया है कि वे नवमी के दिन ही बलि प्रथा को संपन्न करें.
प्राचीन मान्यता और राज परिवार की कुलदेवी
प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण 12वीं सदी में भगवान विश्वकर्मा ने स्वयं किया था. कहा जाता है कि तमाड़ के तत्कालीन राजा को सपने में यह संकेत मिला था कि झाड़ी में मां का मंदिर छिपा हुआ है. राजा ने जब झाड़ी साफ करवाई तो वहां माता का मंदिर स्थापित मिला, जिसके बाद से ही यहां पूजा-अर्चना शुरू हो गई. दिउड़ी मंदिर को राज परिवार की कुलदेवी भी माना जाता है.
मंदिर की संरचना और इतिहास
यह प्राचीन मंदिर बड़े-बड़े काले पत्थरों से निर्मित है और देखने में अद्भुत है. बताया जाता है कि पहले मंदिर का दरवाजा भी पत्थर का था, जिसे बाद में हटा दिया गया. मंदिर के प्रधान पुजारी ने जानकारी दी कि उनके दादाजी ने इस मंदिर में पूजा शुरू की थी, और तब से आज तक माता की पूजा लगातार हो रही है. मंदिर काफी पुराना होने के कारण इसे हटाया नहीं गया, बल्कि इसके ऊपर एक नया और विशाल मंदिर बनाने का काम वर्ष 2000 में शुरू किया गया, जो अब बनकर तैयार है.
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