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रांची/डेस्कः- रामनवमी का पावन पर्व 6 अप्रैल को पूरे देश में बड़े धुमधाम से मनाए जाने की तैयारी पूरे जोरों पर है. सनातन धर्म के लिए ये त्योहार का बड़ा खास महत्व है. इस दिन भगवान श्री राम के भक्त जप, तपस्या, पूजा, वर्त, कथा करवा कर विशेष लाभ की प्राप्ति करते हैं. आईए जानते हैं आखिर क्या है रामनवमी के पीछे का इतिहास..
इसवर्ष रामनवमी का त्याोहार देश में 6 अप्रैल को मनाया जाएगा. वास्तव मे रामनवमी चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की नवम तिथि के दिन मनाया जाता है इसी दिन भगवान विष्णु घरती लोक पर भगवान श्री राम के रुप में जन्म लिए थे. रामलला के जन्म के उपलक्ष पर पूरे देश ही नहीं विश्व में भी रामनवमी का त्यौहार मनाया जाता है. कहा जाता है कि अयौध्या के राजा दशरथ के घर भगवान विष्णु 7वें अवतार के रुप में प्रकट हुए थे. मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम कौशल्या के सबसे बड़े बेटे के रुप में जन्म लिए थे. पूरी दुनिया को सादगी, मर्यादा, अच्छाई, धैर्य, व्यवहार का पाठ पढ़ाने वाले श्री राम के जन्मदिवस के दिन ही रामनवमी मनाया जाता है.
आईए जानते हैं रामनवमी के इतिहास के बारे में
कहा जाता है कि मर्यादा पूरुषोत्तम श्री राम का जन्म त्रैता काल के शुक्ल पक्ष के नवमी के दिन अयोध्या के सुर्यवंशी क्षत्रिय वंश के कुल में हुआ था. शास्त्रों में मुताबिक राजा दसरथ की तीन पत्नियां थी और तीनो के पास कोई संताने नहीं थी. संतान के न होने के चलते राजा दशरथ के पास सबकुछ होने के बाद भी कुछनहीं था. संतानोत्पत्ति की सुख भोगने के लिए राजा दशरथ महर्षि वशिष्ठ के शरण में गए जहां उन्हे यज्ञ करवाने की सलाह दी गई. यज्ञ कराने के पश्चात राजा दशरथ के तीनों पत्नियां गर्भवती हो गई, उन्ही में से रानी कौशल्या को श्री राम के रुप में संतान की प्राप्ति हुई.