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आज मनाया जा रहा है आदिवासियों का प्रसिद्ध त्योहार सरहूल, आईए जानते हैं इसके बारे में..

झारखंड में रखता है एक अलग महत्व
आज मनाया जा रहा है आदिवासियों का प्रसिद्ध त्योहार सरहूल, आईए जानते हैं इसके बारे में..

न्यूज11 भारत


रांची/डेस्कः- सरहूल केवल एक पर्व ही नही बल्कि ये प्रकृति व जीवन संबंधित संतुलन बनाने का प्रतीक है. सरहूल का उत्सव हमें बताता है कि मानव जीवन का संबंध प्रकृति से कितना जुड़ा हुआ है. इसको संरक्षित करना हमारी जिम्मेदारी भी है. झारखंड समेत कई राज्यों में सरहूल पर्व का एक अलग महत्व है. यह पर्व हमें अपने जड़ों से जोड़े रखती है. 




हर वर्ष चैत्र महीने में मनाया जाता हैं

झारखंड, छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों में 1 अप्रैल को ये पर्व बड़े धुमधाम से मनाए जाएंगे. यह पर्व हर वर्ष चैत्र महीने में मनाया जाता है, जब प्रकृति अपने नए रुप में खिलती है. यह पर्व मुख्यत आदिवासियों का त्योहार है. इस पर्व में प्रकृति की अराधना की जाती है. यह त्योहार पारंपरिक रीति रिवाजों के माध्यम से मनाई जाती है जो सांस्कृतिक धरोहर को प्रदर्शित करती है.

 

सखुआ फूल की क्रांति

झारखंड में मनाया जाने वाला ये त्योहार झारखंड में बड़ी धुमधाम से मनाया जाता है. इस दिन आदिवासी नए साल का स्वागत करते हैं. इस अवसर पर प्रकृति अपने नए स्वरुप में नजर आती है. जब पेड़ों पर नए फूल पौधे खिलते नजर आते हैं. सरहूल वैसे दो शब्दों से मिलकर बना है सर औऱ हूल. सर का अर्थ होता है सखुआ या साल का फूल, वहीं हुल का अर्थ होता है क्रांति. इसे सखुआ फूल की क्रांति भी कहा जाता है. यह पर्व चैत्र महीने के अमावश्या के तीसरे दिन मनाया जाता है. इस दिन लोग अखाड़े में नाच-गान करते नजर आते हैं. लोग पूजा अर्चना में भाग लेते हैं.  सरहूल का अर्थ साल फूल की पूजा करना भी होता है. इस दौरान साल वृक्ष की विशेष पूजा की जाती है. इसे प्रकृति का प्रतीक कहा जाता है. इस दौरान पूजा के टाइम पाहन साल वृक्ष के डालियों से देवी देवताओं की अराधना करते हैं औऱ समुदाय के लिए सुख सुविधा के लिए प्रार्थना भी करते हैं. 

 

ढोल नगाड़ों के साथ मनाया जाता है उत्सव

यह पर्व पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश देते हैं. इस दिन लोग जंगल, धरती, नदी, नाला की पूजा करते नजर आते हैं. उन्हे संरक्षित करने को लेकर संकल्पित होते हैं. इस दौरान हंड़िया व पारंपरिक व्यंजन भी तैयार किए जाते हैं. बता दे कि इस अवसर के दौरान झारखंड के रांची, गुमला, खूंटी, लोहरदगा और सिंहभूम जिलों में विशेष कार्यक्रम आयोजित की जाती है. रांची में इसको लेकर एक भव्य जूलूस निकाला जाता है. इसमें हजारो लोग शामिल होते हैं. ढोल नगाड़ों के साथ उत्सव मनाया जाता है लोग आदिवासी नृत्य व गीत पर थिरकते नजर आते हैं. 

पूरे देश में इस पर्व को लेकर उत्साह

 

जड़ों से जोड़े रखती है पर्व

सरहूल के मुख्यसंदेश ही होता है प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करना. पर्यावरण संरक्षण व प्रकृतिक संतुलन बनाए रखना इस पर्व का मुख्य संकल्प होता है. झारखंड सहित पूरे देश में इस पर्व को लेकर उत्साह बढती जा रही है,यह पर्व हमें जड़ों से जोड़े रखती है. 





 


 
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