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रांची/डेस्क: लगता है 'दीदी' के समर्थक लोकतंत्र और न्यायिक प्रक्रिया में भरोसा नहीं रखते. 'जबरदस्ती न्याय' पाने के लिए के लिए अब तो वह सीधे-सीधे गुंडागर्दी पर उतर आये हैं. मामला एसआईआर यानी विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण में कथित गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए न्यायालय के दरवाजे पर पहुंची तृणमूल कांग्रेस के 'उचित न्याय' दिलाने के लिए समर्थन में उतरे तथाकथित प्रदर्शनकारियों ने चुनाव आयोग का न सिर्फ घेराव किया, बल्कि 7 न्यायिक अधिकारियों के 9 घंटे तक बंधक बनाये रखा. उनकी गाड़ियों में तोड़फोड़ भी की गयी. ये प्रदर्शनकारी कौन हो सकते हैं, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है, क्योंकि पश्चिम बंगाल की मुखिया हर मंच पर चुनाव आयोग, एसआईआर प्रक्रिया, केन्द्र सरकार की नीयत पर लगातार सवाल उठा रही हैं. पांच राज्यों के साथ पश्चिम बंगाल में भी चुनाव होना है, और 'दीदी' अपने पिछले चुनावों की तरह ही हर वह हथकंडा अपना लेना चाहती हैं, जो उन्हें फिर से कुर्सी पर ले जाकर बैठा सके.
'दीदी' के समर्थकों का 'अपराध' कितना संगीन था कि सुप्रीम कोर्ट को भी संज्ञान लेना पड़ा. सुप्रीम कोर्ट का नाराजगी कितनी सख्त थी कि यह मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत के बयान से साफ झलकता है, उन्होंने कहा- "रात 11 बजे तक आपका कलेक्टर वहां नहीं था. मुझे रात में मौखिक रूप से बहुत सख्त आदेश देने पड़े. मुझे कड़े आदेश जारी करने पड़े तभी प्रशासन हरकत में आया. न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा के लिए कहीं से भी बल बुलाने का अधिकार हम चुनाव आयोग पर छोड़ते हैं."
बता दें कि प्रदर्शनकारियों का आचरण कितना अमानवीय था इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महिला न्यायिक अधिकारी, जिनमें से एक का 5 साल का बच्चा है, उन्हें भी घंटों बंधक बनाये रखा गया. इसका जिक्र भी CJI ने अपने बयान में किया.
कोर्ट ने घटना को सोची-समझी साजिश बताया
CJI ने अपनी बात यहीं पर खत्म नहीं कि उन्होंने कहा कि जो कुछ भी किया गया वह न्यायिक अधिकारियों का मनोबल गिराने की एक सोची-समझी चाल थी. और उससे ज्यादा राज्य प्रशासन का रवैया. घेराव दोपहर 3:30 बजे शुरू हुआ.रजिस्ट्रार जनरल ने अधिकारियों को सूचित भी किया, लेकिन रात 8:30 बजे तक कुछ नहीं किया गया. गृह सचिव और DGP से सम्पर्क किया गया. शीघ्र कार्रवाई का आश्वासन भी दिया गया, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया.
मालदा में किया गया था चुनाव आयोग कार्यालय का घेराव
बता दें कि एसआईआर प्रक्रिया के विरोध में प्रदर्शनकारियों द्वारा जो घेराव किया गया था, वह मालदा में किया गया था. प्रदर्शनकारी SIR प्रक्रिया में जुटे न्यायिक अधिकारियों से मिलना चाहते थे, लेकिन अनुमति नहीं मिलने के बाद प्रदर्शन करने लगे. इसके बाद इन्हें बंधक बना लिया गया जिसमें 3 महिलाओं समेत 7 न्यायिक अधिकारी था, वे भूखे-प्यासे अंदर ही फंसे रहे. जो कोर्ट का 'हथौड़ा' पड़ने के बाद रात करीब 12 बजे बाहर आ सके.
ममता बनर्जी ने भाजपा पर ही लगाया आरोप
एक तरफ जहां न्यायिक अधिकारियों के घेराव आरोप टीएमसी कार्यकर्ताओं पर लग रहा हैं, वहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का कहना है कि यह काम उनकी पार्टी नहीं, बल्कि यह सब बीजेपी का किया धराया है. उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं पता कि न्यायिक अधिकारियों का घेराव करने वाले लोग कौन थे, लेकिन यह सच जरूर है कि पश्चिम बंगाल के लोग SIR से नाराज जरूर हैं. उन्होंने एक बार फिर वही रोना रोया कि उनके पास कोई अधिकार नहीं है, उनकी सारी शक्ति छीन ली गया है, यहां तक कि कानून व्यवस्था और सब कुछ."
बता दें कि भले ही पश्चिम बंगाल में चुनाव की घोषणा हो गयी है, पश्चिम बंगाल में 2 चरणों में 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को मतदान होगा. लेकिन SIR की प्रक्रिया अभी भी जारी है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद करीब 60 लाख 'विचाराधीन' मतदाताओं की जांच के लिए न्यायिक अधिकारियों को नियुक्त किया गया है. इन्हीं न्यायिक अधिकारियों में से कुछ अधिकारियों को मालदा में घेराव किया गया था. बता दे कि SIR प्रक्रिया के बाद राज्य से करीब 76 लाख मतदाताओं के नाम कट गए हैं
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