हाई कोर्ट

जीजा पर साली को अगवा कर देह व्यापार में धकेलने का आरोप निकला झूठा, हाई कोर्ट ने 7 साल की सजा रद्द कर किया बरी

माननीय न्यायमूर्ति अरुण कुमार राय की एकल पीठ ने आरोपी को सभी आरोपों से सम्मान बरी करने का आदेश जारी किया है.

By : Ark Sahuliyar
जीजा पर साली को अगवा कर देह व्यापार में धकेलने का आरोप निकला झूठा, हाई कोर्ट ने 7 साल की सजा रद्द कर किया बरी

न्यूज़11 भारत 
रांची/डेस्क:
झारखंड उच्च न्यायालय ने अपनी ही सगी साली को अगवा करने और उसे जबरन बिहार की राजधानी पटना ले जाकर देह व्यापार (वेश्यावृत्ति) के धंधे में धकेलने के गंभीर आरोप में घिरे एक व्यक्ति को बड़ी राहत दी है. अदालत ने मामले के सबूतों में भारी विरोधाभास, एफआईआर दर्ज कराने में हुई लंबी देरी और शिकायतकर्ता पक्ष के अप्राकृतिक आचरण को रेखांकित करते हुए बोकारो की निचली अदालत द्वारा दोषी को दी गई 7 साल की कठोर कारावास की सजा को पूरी तरह से निरस्त कर दिया है. माननीय न्यायमूर्ति अरुण कुमार राय की एकल पीठ ने आरोपी को सभी आरोपों से सम्मान बरी करने का आदेश जारी किया है.

क्या था मामला और क्या थे आरोप?
यह पूरा कानूनी विवाद बोकारो जिले के बालीडीह थाना क्षेत्र से जुड़ा है. साल 2014 में दर्ज प्राथमिकी के अनुसार, शिकायतकर्ता (पीड़िता के पिता) ने आरोप लगाया था कि उनका दामाद अजय कुमार पासवान उर्फ साजन पासवान (हजारीबाग का निवासी) 4 दिसंबर 2013 की दोपहर करीब 2:30 बजे उनकी 16 वर्षीय छोटी बेटी (साली) को रास्ते में ट्यूशन छोड़ने के बहाने अपनी मोटरसाइकिल पर बैठाकर ले गया.

पीड़िता ने अदालत में दिए अपने बयान में आरोप लगाया था कि उसका जीजा उसे बहला-फुसलाकर पहले बोकारो के सेक्टर-11C स्थित एक क्वार्टर में ले गया, जहां उसकी बड़ी बहन (आरोपी की पत्नी) नहीं मिली. वहां उसे धमकी देकर रोका गया और फिर 11 दिसंबर 2013 को उसे ट्रेन से पटना के हनुमान नगर स्थित 'दिलीप' नामक व्यक्ति के घर ले जाया गया. पीड़िता का आरोप था कि वहां उसे जबरन देह व्यापार के दलदल में धकेलने का प्रयास किया गया, और जब उसने इसका विरोध किया तो ब्लेड से उसका हाथ काट दिया गया और उसकी मां से 2 लाख रुपये की रंगदारी मांगी गई. बाद में, युवती द्वारा फोन पर दी गई पते की जानकारी के आधार पर उसके माता-पिता और भाई पटना पहुंचे और उसे वापस बोकारो लेकर आए.

निचली अदालत ने दी थी 7 साल की सजा
इस मामले में बोकारो की अतिरिक्त सत्र अदालत (फास्ट ट्रैक कोर्ट) ने साल 2017 में साक्ष्यों के आधार पर जीजा अजय कुमार पासवान को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 366 (महिला का अपहरण/उत्पीड़न) के तहत दोषी करार देते हुए 7 साल की जेल और 5,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी. इस फैसले के खिलाफ दोषी ने साल 2017 में हाई कोर्ट में अपील दायर की थी, जिस पर अब जाकर अंतिम निर्णय आया है.

हाई कोर्ट ने क्यों पलटा निचली अदालत का फैसला?
निचली अदालत ने लड़की के माता-पिता के मौखिक बयान के आधार पर उसे नाबालिग (15-16 वर्ष) मानकर फैसला सुनाया था. हालांकि, हाई कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष ने लड़की की उम्र से जुड़ा कोई भी आधिकारिक स्कूल सर्टिफिकेट या जन्म प्रमाण पत्र अदालत में पेश नहीं किया. इसके विपरीत, लेडी डॉक्टर की मेडिकल और रेडियोलॉजिकल जांच रिपोर्ट में यह साफ तौर पर सामने आया कि घटना के वक्त लड़की की उम्र 18 वर्ष से अधिक यानी वह पूरी तरह बालिग थी. कोर्ट ने माना कि चूंकि वह बालिग थी और बिना किसी शोर-शराबे के गई थी, इसलिए कानूनी रूप से अपहरण का मामला नहीं बनता.

पीड़िता ने खुद अपने क्रॉस-एग्जामिनेशन (जिरह) में यह स्वीकार किया कि पटना में दिलीप के घर में दिलीप की पत्नी और बच्चे भी साथ रहते थे और वह वहां पूरे ढाई महीने तक रही. सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि पीड़िता ने माना कि उसका जीजा अजय पासवान वहां उसके साथ लगातार नहीं रहता था, बल्कि वह बोकारो में रहता था और कभी-कभार सिर्फ एक या दो दिन के लिए पटना आता था. हाई कोर्ट ने इस पर तार्किक टिप्पणी करते हुए कहा कि जब मुख्य आरोपी खुद वहां मौजूद ही नहीं था, तो वह ढाई महीने तक लड़की को जबरन वेश्यावृत्ति के धंधे में कैसे धकेल सकता था? लड़की ने इतने लंबे समय में न तो पड़ोसियों से मदद मांगी और न ही वहां से भागने का प्रयास किया, जो दर्शाता है कि वह अपनी मर्जी से वहां रह रही थी.

हाई कोर्ट ने सबसे गंभीर सवाल पीड़िता के माता-पिता के आचरण पर उठाया. पीड़िता के माता-पिता ने कोर्ट में गवाही दी थी कि जब वे अपनी बेटी को छुड़ाने पटना के हनुमान नगर पहुंचे, तो वहां आरोपी जीजा (अजय पासवान) भी साक्षात मौजूद था. कोर्ट ने आश्चर्य जताते हुए कहा कि अगर किसी जीजा ने उनकी बेटी को अगवा कर वेश्यावृत्ति में धकेला था, तो सामने दिखने के बावजूद माता-पिता ने तुरंत पटना पुलिस की मदद क्यों नहीं ली और आरोपी को गिरफ्तार क्यों नहीं कराया? वे चुपचाप बेटी को लेकर बोकारो आ गए. इसके अलावा, बोकारो पुलिस के जांच अधिकारी (IO) ने न तो कभी पटना के उस कथित घर का दौरा किया और न ही मकान मालिक दिलीप से कोई पूछताछ की.

अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, लड़की 4 दिसंबर 2013 को लापता हुई थी और परिवार को 10 दिसंबर को ही पता चल गया था कि वह जीजा के साथ गई है. इसके बावजूद, पुलिस में आधिकारिक तौर पर एफआईआर 3 जनवरी 2014 को दर्ज कराई गई. इस एक महीने की लंबी देरी का शिकायतकर्ता पक्ष के पास कोई ठोस कारण नहीं था, जिससे पूरी कहानी मनगढ़ंत प्रतीत होती है.

अदालत का अंतिम निष्कर्ष
न्यायाधीश अरुण कुमार राय ने सुप्रीम कोर्ट के स्थापित न्यायिक सिद्धांत (Kavita Chandrakant Lakhani case) का हवाला देते हुए अपने फैसले में स्पष्ट किया कि महज किसी महिला को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना धारा 366 के तहत अपराध नहीं है, जब तक कि जबरन शादी या अवैध शारीरिक संबंध बनाने की आपराधिक मंशा साबित न हो.

चूंकि इस मामले में पीड़िता के आचरण, उम्र और माता-पिता की गवाही में गंभीर विरोधाभास हैं और अभियोजन पक्ष केस को 'संदेह से परे' साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है, इसलिए अजय कुमार पासवान को 'बेनिफिट ऑफ डाउट' (संदेह का लाभ) देते हुए बरी किया जाता है. आरोपी पहले से ही जमानत पर बाहर है, इसलिए अदालत ने उसे बेल बांड की सभी कानूनी देनदारियों से तुरंत मुक्त करने का आदेश दिया.
 

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