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रांची/डेस्क: झारखंड उच्च न्यायालय ने दहेज प्रताड़ना के एक 19 साल पुराने मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. अदालत ने कहा कि जब निचली अदालत पहले ही इस मामले में मुख्य आरोपी पति को प्रताड़ना के आरोप से और देवर को दुष्कर्म के गंभीर आरोप से बरी कर चुकी है, तो उन्हीं परिस्थितियों के आधार पर सास को दोषी ठहराना कानूनन सही नहीं है. न्यायाधीश अरुण कुमार राय की एकल पीठ ने गवाहों के बयानों में भारी विरोधाभास को देखते हुए बुजुर्ग सास की 1 साल की जेल की सजा को पूरी तरह से रद्द कर दिया और उन्हें बरी करने का आदेश जारी किया.
क्या था पूरा मामला?
यह पूरा विवाद साहिबगंज जिले के बरहैट (राजमहल अंचल) थाना क्षेत्र का है. एक विवाहिता ने शिकायत दर्ज कराई थी कि उसका विवाह वर्ष 2007 में हुआ था. शादी के समय उपहार के तौर पर 30,000 रुपये नकद और कुछ सामान दिए गए थे. आरोप था कि विवाह के एक हफ्ते बाद ही ससुराल वालों ने यह कहते हुए प्रताड़ित करना शुरू कर दिया कि तयशुदा 50,000 रुपये में से 20,000 रुपये बकाया हैं. महिला का यह भी आरोप था कि उसका पति पैसे न मिलने के कारण झगड़कर घर से भाग गया. इसके बाद जब वह दोबारा ससुराल आई, तो उसके देवर ने उसके साथ दुष्कर्म किया और सास-ससुर ने उसे बेरहमी से पीटकर घर से निकाल दिया.
निचली अदालत का विरोधाभासी फैसला
राजमहल की अतिरिक्त सत्र अदालत ने साल 2017 में इस मामले की सुनवाई करते हुए देवर को दुष्कर्म के आरोप से और मुख्य आरोपी पति को प्रताड़ना के आरोप से पूरी तरह मुक्त (बरी) कर दिया था. लेकिन, अदालत ने ससुर और सास को दोषी मानते हुए 1-1 साल की जेल और 5,000 रुपये जुर्माने की सजा सुना दी थी. इस फैसले के खिलाफ सास-ससुर ने साल 2017 में हाई कोर्ट में अपील दायर की थी.
हाई कोर्ट ने बरी करने के पीछे क्या कारण बताए?
मुकदमे के लंबित रहने के दौरान ससुर की 30 दिसंबर 2022 को मृत्यु हो गई, जिसके कारण उनके खिलाफ केस समाप्त हो गया था. हाई कोर्ट ने एकमात्र जीवित बची आरोपी सास के केस की बारीकी से समीक्षा की. अदालती दस्तावेजों से खुलासा हुआ कि पति ने 2 दिसंबर 2005 को ही अपनी पत्नी और सगे भाई (देवर) के बीच अवैध संबंधों का आरोप लगाते हुए कोर्ट में तलाक का मुकदमा दर्ज करा दिया था. लड़की और उसके पिता को इस बात की पूरी जानकारी थी. खुद को फंसता देख महिला ने पति के केस करने के एक साल से अधिक समय बाद जनवरी 2007 में यह प्रताड़ना और दुष्कर्म की कहानी गढ़ते हुए एफआईआर दर्ज कराई. सुप्रीम कोर्ट के स्थापित नियमों के मुताबिक, ऐसी बदला लेने वाली शिकायतें कानूनन टिकने योग्य नहीं हैं.
हाई कोर्ट ने पाया कि पीड़िता और उसके माता-पिता ने अपनी गवाही में "ससुराल वालों" शब्द का प्रयोग तो किया, लेकिन पूरी गवाही में सास द्वारा सीधे तौर पर मारपीट करने या व्यक्तिगत रूप से प्रताड़ित करने का कोई एक भी विशिष्ट उदाहरण पेश नहीं किया गया. पिता ने खुद माना कि उन्होंने बेटी के साथ कभी कोई क्रूरता होते हुए अपनी आंखों से नहीं देखी थी.
पीड़िता ने गवाही में कहा कि वह अपनी पहली विदाई में ससुराल में सिर्फ एक हफ्ता रुकी और दूसरी बार में तीन से चार महीने रही. इसके बिल्कुल उलट, उसके अपने सगे पिता ने कोर्ट में गवाही दी कि उनकी बेटी शादी के बाद लगातार 1 साल 5 महीने तक अपने ससुराल में रही थी. कोर्ट ने कहा कि जब गवाहों के मूल बयानों में ही इतना बड़ा अंतर हो, तो उस कहानी पर भरोसा कर किसी को जेल नहीं भेजा जा सकता.
अदालत का अंतिम आदेश
उच्च न्यायालय ने कहा कि जब मुख्य रिश्तों (पति और देवर) के खिलाफ लगे आरोप झूठे और संदेहास्पद पाए जा चुके हैं, तो सास के खिलाफ मामला पूरी तरह से असंभव और मनगढ़ंत प्रतीत होता है. अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को 'संदेह से परे' साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है. अदालत ने कर्मी देवी को 'बेनिफिट ऑफ डाउट' (संदेह का लाभ) देते हुए बरी कर दिया और उन्हें उनके बेल बॉन्ड की सभी देनदारियों से मुक्त करने का निर्देश दिया.