वीरेन्द्र शर्मा/न्यूज़ 11 भारत
बरही/डेस्क: चौपारण की धरती हजारों साल पुरानी ऐतिहासिक विरासत समेटे हुए है. प्रखंड के दुर्गम जंगलों में जगह-जगह बिखरे पुरातात्विक अवशेष फिर से इसकी प्राचीनता को साबित कर रहे हैं.
शुक्रवार को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई), रांची अंचल की टीम ने चोरदाहा पंचायत के सिलोदर, छोटकी मुर्तिया और बड़की मुर्तिया के जंगली क्षेत्रों का भ्रमण कर प्राचीन मूर्तियों और अवशेषों का निरीक्षण किया.
एएसआई ने किया दस्तावेजीकरण
एएसआई रांची मंडल के सहायक पुरातत्वविद् डॉ. नीरज मिश्रा ने अधीक्षण पुराविद् डॉ. करबी साहा के निर्देशन में सर्वेक्षण किया. उन्होंने बताया कि चौपारण प्राचीन उत्तरापथ पर स्थित महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है. यहां से कई सहायक मार्ग छोटानागपुर पठार और झारखंड के अन्य हिस्सों को जोड़ते थे. क्षेत्र में बौद्ध, जैन और सनातन धर्म से जुड़े बड़ी संख्या में साक्ष्य मिलते हैं. जंगलों में बौद्ध देवी तारा, मनौती स्तूप, प्राचीन शिवलिंग और प्रस्तर मंदिरों के अवशेष मौजूद हैं. टीम के साथ छायाकार झा, जगदीश यादव, राजकुमार यादव समेत अन्य मौजूद थे.
शताब्दी पूर्व पड़ा मुर्तिया नाम
ग्रामीणों के अनुसार करीब 200 वर्ष पूर्व सरकारी दस्तावेजों में गांव का नाम मुर्तिया रखा गया, क्योंकि जंगल में प्राचीन मूर्तियां मिली थीं. छोटकी और बड़की मुर्तिया में ग्रामीणों को दशकों पहले कई प्रस्तर मूर्तियां मिलीं, जिन्हें मंदिर बनाकर सुरक्षित रखा गया.
सिलोदर में ढाई फुट की मां तारा की अद्भुत प्रतिमा
सिलोदर निवासी समाजसेवी जगदीश यादव को करीब 30 साल पहले नदी किनारे जंगल में ढाई-तीन फुट ऊंची प्राचीन प्रतिमा मिली थी. उन्होंने होटल परिसर में मंदिर बनाकर स्थापित किया. एएसआई टीम ने इसे बौद्ध देवी तारा की दुर्लभ प्रतिमा बताया, जो ललितासन में है और मस्तक पर गौतम बुद्ध की विभिन्न मुद्राएं हैं. यह 7वीं-8वीं सदी की मानी जा रही है. बड़की मुर्तिया में मनौती स्तूप भी मिला है.
बोधगया जाने वाला प्राचीन मार्ग
विशेषज्ञों के अनुसार चौपारण से बोधगया और इटखोरी के बीच प्राचीन मार्ग होने के संकेत हैं. महाने नदी और जंगलों के रास्ते बोधगया से चोरदाहा, मुर्तिया, सिलोदर होते हुए हथिंदर, सोहरा, दैहर और इटखोरी तक मार्ग जाता था. इसी मार्ग के आसपास अवशेष मिलना महत्वपूर्ण है.
वरिष्ठ पत्रकार शशि शेखर ने पिछले 22 वर्षों से* इस पर शोधपरक रिपोर्ट प्रकाशित करता रहा है.
संरक्षण और पर्यटन की अपार संभावना
विशेषज्ञों का कहना है कि पूरे क्षेत्र के वैज्ञानिक सर्वेक्षण, संरक्षण और विकास की जरूरत है. वन विभाग, पुरातत्व विभाग और जिला प्रशासन मिलकर मेगा प्लान बनाएं तो चौपारण अंतरराष्ट्रीय पुरातात्विक और पर्यटन केंद्र बन सकता है.
स्थानीय ग्रामीणों ने विरासत बचाने में अहम भूमिका निभाई है. जगदीश यादव, राजकुमार यादव, प्रभात यादव, सुखदेव पासवान समेत कई ग्रामीणों ने मूर्तियों को सुरक्षित रखा है, जिसकी एएसआई टीम ने भी सराहना की.
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