आशिष शास्त्री/न्यूज11 भारत
सिमडेगा/डेस्क: इंडियन बैंक सिमडेगा के नीचे मंगलवार को एक ऐसी तस्वीर देखने को मिली जिसने पत्थर दिल इंसान को भी झकझोर कर रख दिया. एक तरफ भीड़ से भरा शहर था तो दूसरी तरफ एक बेबस बेटी अपने अचेत पिता को उठाने की नाकाम कोशिश करते हुए बिलख रही थी. सैकड़ों लोग वहां से गुजरे, पर किसी की ममता नहीं जागी. किसी का हाथ मदद के लिए नहीं बढ़ा. उनके पिता कोनमेंजरा निवासी मनोहर डुंगडुंग पहले ही एक ट्रेन हादसे में अपना एक हाथ गंवा चुके थे और पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे. अपनी बीमारी का इलाज कराने की उम्मीद लिए पैसे निकालने वे इंडियन बैंक सिमडेगा शाखा पहुंचे थे. उन्होंने 26 हजार रुपये की निकासी फॉर्म भरा. लेकिन बैंक का लिंक भी काफ़ी देर से फेल था. आख़िर में वे बैंक के नीचे सीढ़ियों पर अपनी बेटी के साथ बैठ कर पैसे मिलने का इंतजार कर रहे थे. इसी दौरान मनोहर ने उनसे पानी मांगा. दो घूंट पिया और कहा— थोड़ा आराम करने दो. पर किसे पता था कि यह आराम अनंत काल का होगा. मनोहर फिर कभी नहीं उठे. इस हादसे के बीच वहाँ पर मौजूद लोग नजरें फेर कर निकल रहे थे.
वहीं इत्तेफाक से वहां से गुजर रहे न्यूज़ 11 के संवाददाता और पत्रकार संघ के जिला अध्यक्ष आशीष शास्त्री की नजर उस बिलखती युवती पर पड़ी. युवती की बेबसी देख वे खुद को रोक नहीं पाए. पास जाने पर पता चला कि बुजुर्ग अचेत हैं. जल्द ही हिंदुस्तान अख़बार के फोटोग्राफर सह सिमडेगा पत्रकार संघ के राकेश जायसवाल भी मौके पर पहुंचे. आशीष शास्त्री ने संवेदनशीलता दिखाते हुए तुरंत सदर अस्पताल के चिकित्सकों को फोन कर मौके पर बुलाया. लेकिन जब डॉक्टर ने नाड़ी जांची तो सन्नाटा पसर गया. मनोहर डुंगडुंग इस दुनिया को छोड़ चुके थे. जिस बेटी ने इलाज के सपने देखे थे, उसके सामने अब पिता का शव पड़ा था. उन्होंने अपने भाई को बैंक तो बुला लिया था. पर बेबसी ऐसी थी कि पिता का शव घर ले जाने तक के लिए भी उनके पास पैसे नहीं थे.
तब तक नगर परिषद उपाध्यक्ष सह सिमडेगा पत्रकार संघ के दीपक रिंकू और सिमडेगा पत्रकार संघ के विकास साहू भी वहां पहुंच चुके थे. इन कलम के सिपाहियों ने केवल शोक नहीं जताया बल्कि पीड़ित परिवार के आंसू पोंछने के लिए तुरंत आर्थिक मदद का हाथ बढ़ाया. उनके पहल से समाजसेवी सह सब्जी व्यापारी भरत प्रसाद ने 5,000 रुपये, इंडियन बैंक प्रबंधन ने 5,000 और एक अन्य समाजसेवी ने 5,000 रुपये का सहयोग दिया. वहीं बैंक प्रबंधक ने भी 26 हज़ार रुपये बिना लिंक के ही दे दी. ताकि इस दुख की घड़ी में परिजनों को दर दर न भटकना पड़े. इसके बाद पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए सदर अस्पताल भेजा. जहाँ तुरंत पोस्टमार्टम कराकर कर परिजनों को सौंप दिया. इस घटना के बाद सिमडेगा के पत्रकारों ने साबित कर दिया कि पत्रकारिता केवल खबरें लिखना नहीं बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति के आंसू पोंछना भी है. जहाँ दुनिया तमाशबीन बनी रही. वहीं सिमडेगा पत्रकार संघ की टीम ने मानवता का धर्म निभाया.
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