न्यूज़11 भारत
रांची/डेस्क: झारखंड उच्च न्यायालय ने धनबाद के एक चर्चित दहेज हत्या मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए दोषी पति की 7 साल की जेल की सजा को बरकरार रखा है. कोर्ट ने आरोपी की उस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें उसने दावा किया था कि उसकी पत्नी खाना बनाते समय कोयला चूल्हे (कौयला चूल्हा) की आंच से दुर्घटनावश जल गई थी.
हाई कोर्ट का वैज्ञानिक तर्क: तरल ईंधन के बिना 80% जलना असंभव
न्यायाधीश अरुण कुमार राय की एकल पीठ ने मामले की वैज्ञानिक और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर समीक्षा की. अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि मृतका माही देवी का शरीर 80 प्रतिशत तक पूरी तरह और समान रूप से झुलस गया था.
कोर्ट ने तकनीकी टिप्पणी करते हुए कहा कि घर में खाना पकाने के लिए कोयला चूल्हे का इस्तेमाल होता था. कोयला चूल्हा एक ठोस ईंधन है, जिसमें प्रेशर स्टोव की तरह विस्फोट होने की कोई गुंजाइश नहीं होती. कोयला चूल्हे से होने वाली दुर्घटनाओं में शरीर का निचला हिस्सा प्रभावित होता है और घाव ऊपर की ओर बढ़ते हैं, लेकिन पूरे शरीर का 80% हिस्सा समान रूप से झुलस जाना साफ तौर पर इशारा करता है कि मृतका पर केरोसिन या पेट्रोल जैसे किसी तीव्र ज्वलनशील तरल पदार्थ का इस्तेमाल किया गया था. इसके अलावा जांच अधिकारी को बेडरूम की दीवार पर काले धुएं के निशान और जले हुए पलंग का कोना मिला था, जो रसोई की दुर्घटना के दावे को झुठलाता है.
एक लाख की मांग और क्रूरता साबित
मामला धनबाद जिले के सुदामडीह (जोरापोखर) का है, जहां 1 जुलाई 2009 को माही देवी का विवाह दिलीप कुमार महतो से हुआ था. शादी के बाद से ही पति और सास द्वारा 1 लाख रुपये दहेज की मांग को लेकर उसे लगातार प्रताड़ित किया जा रहा था. 20 फरवरी 2012 को माही को गंभीर रूप से जलाया गया, जिसके बाद इलाज के दौरान 24 फरवरी 2012 को अस्पताल में उसकी मौत हो गई थी.
क्रिकेट खेलने का बहाना भी पड़ा फीका
आरोपी पति दिलीप महतो ने अदालत में खुद को बेकसूर बताते हुए अजीबोगरीब दलील दी थी कि घटना के वक्त वह घर से कुछ दूरी पर क्रिकेट खेल रहा था और उसे ग्रामीणों से इसकी सूचना मिली. हालांकि, वह अदालत में उन ग्रामीणों के नाम तक नहीं बता सका, जिससे कोर्ट ने उसकी इस कहानी को पूरी तरह अविश्वसनीय माना.
हाई कोर्ट का अंतिम आदेश
निचली अदालत ने साल 2016 में पति को धारा 304-B (दहेज हत्या) के तहत 7 साल की साधारण कारावास की सजा सुनाई थी, जबकि साक्ष्यों के अभाव में सास को बरी कर दिया था. हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि कानून (भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 113-B) के तहत शादी के 7 साल के भीतर हुई इस संदिग्ध मौत में खुद को बेकसूर साबित करने की जिम्मेदारी पति की थी, जिसमें वह पूरी तरह विफल रहा. कोर्ट ने दोषी की अपील को पूरी तरह खारिज करते हुए उसकी सजा को यथावत बनाए रखने का आदेश दिया.
यह भी पढ़ें- हर 'Breach of Promise' रेप नहीं, शादी से मुकर जाना 'झूठा वादा' नहीं माना जा सकता: हाई कोर्ट